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	<title>Indian government Archives - Prabhat Bharat</title>
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		<title>क्या आप जानते हैं: भारत में भी है सम्मान के साथ मरने का अधिकार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 13 Oct 2024 01:30:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[खास खबर]]></category>
		<category><![CDATA[Do you know that in India too there is a right to die with dignity]]></category>
		<category><![CDATA[Doctor]]></category>
		<category><![CDATA[Indian government]]></category>
		<category><![CDATA[Right to die]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सम्मान के साथ मरने का अधिकार: कानूनी होने के बावजूद क्यों चुनते हैं इतने कम लोग? (विजय प्रताप</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/do-you-know-that-in-india-too-there-is-a-right-to-die-with-dignity/">क्या आप जानते हैं: भारत में भी है सम्मान के साथ मरने का अधिकार</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>सम्मान के साथ मरने का अधिकार: कानूनी होने के बावजूद क्यों चुनते हैं इतने कम लोग?</strong></p>
<p>(विजय प्रताप पांडे ) भारत में 2018 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने जीवन के अंतिम चरण में सम्मानपूर्वक मरने के अधिकार को कानूनी रूप से मान्यता दी। इसके तहत मरणासन्न मरीज या उनके देखभाल करने वाले जीवन-रक्षक उपकरणों को हटाने या उपचार को रोकने का निर्णय ले सकते हैं। लेकिन, कानून के बावजूद, बहुत कम लोग इस अधिकार का इस्तेमाल करते हैं। जीवन के अंत की देखभाल (End of Life Care &#8211; EOLC) एक ऐसा विषय है, जो नैतिक, सामाजिक, कानूनी, और चिकित्सा के पहलुओं को एकसाथ जोड़ता है। यह न केवल मरीजों के लिए, बल्कि उनके परिवारों, डॉक्टरों, और समाज के लिए भी एक जटिल और संवेदनशील विषय है।</p>
<p>यह लेख उस मानसिकता, चिकित्सा प्रथाओं, कानूनी बाधाओं, और सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों पर प्रकाश डालेगा, जो सम्मानजनक मृत्यु के कम स्वीकार किए जाने के पीछे हैं। साथ ही, यह विचार करेगा कि कैसे इन चुनौतियों का सामना करके जीवन के अंत की देखभाल को व्यापक रूप से अपनाया जा सकता है।</p>
<p><strong>डॉ. रजनी सुरेंदर भट की कहानी: एक दुर्लभ उदाहरण</strong></p>
<p>बेंगलुरु स्थित पल्मोनोलॉजिस्ट और पैलिएटिव मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. रजनी सुरेंदर भट ने हाल ही में एक परिवार की कहानी साझा की, जो जीवन के अंत की देखभाल के कठिन निर्णयों का सामना कर रहा था। 80 वर्षीय बुजुर्ग, जो डिमेंशिया और पार्किंसंस जैसी बीमारियों से पीड़ित थे, बार-बार संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होते रहे। इस बार, उनके परिवार ने अस्पतालों और उपचार के बजाय, अपने प्रियजन की पीड़ा को समाप्त करने के बारे में सोचा।</p>
<p>डॉ. भट ने परिवार को समझाया कि वे अपने प्रियजन के जीवन समर्थन को हटाने का विकल्प चुन सकते हैं। इस निर्णय ने उन्हें मरणासन्न देखभाल के साथ अपने प्रियजन को सम्मानपूर्वक अलविदा कहने का अवसर दिया। यह कहानी दुर्लभ है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में, परिवार और डॉक्टरों को इस विकल्प के बारे में जानकारी नहीं होती है, या वे इसे अपनाने से हिचकिचाते हैं।</p>
<p><strong>जीवन के अंत की देखभाल: एक कानूनी अधिकार</strong></p>
<p>भारत में &#8220;सम्मानपूर्वक मरने का अधिकार&#8221; कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग मामले की सुनवाई के दौरान निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिसके बाद 2018 में एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव (AMD) या &#8220;लिविंग विल&#8221; की अवधारणा को कानूनी मान्यता मिली। AMD के तहत, मरणासन्न रोगी पहले से ही यह निर्णय ले सकता है कि जब वह किसी इलाज या जीवन रक्षक उपचार को आगे नहीं चाहता, तो उसे वापस ले लिया जाए।</p>
<p>निष्क्रिय इच्छामृत्यु का मतलब है कि जीवन को जबरन लंबा करने वाले उपचार को रोका जाए या हटाया जाए, जिससे व्यक्ति की स्वाभाविक मृत्यु हो सके। यह फैसला परिवार को मानसिक, भावनात्मक, और शारीरिक रूप से कठिन उपचार प्रक्रियाओं से बचने का मौका देता है।</p>
<p>लेकिन सक्रिय इच्छामृत्यु, जो डॉक्टर के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के माध्यम से मृत्यु लाने की प्रक्रिया है, भारत में अभी भी अवैध है। इसका अर्थ यह है कि डॉक्टर किसी गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को जान-बूझकर मारने का कार्य नहीं कर सकते, भले ही यह व्यक्ति की इच्छा हो।</p>
<p><strong>जीवन के अंत की देखभाल को अपनाने में कानूनी जटिलताएँ</strong></p>
<p>हालांकि जीवन के अंत की देखभाल कानूनी रूप से स्वीकृत है, लेकिन इसे अपनाने में कई कानूनी जटिलताएँ हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जीवन समर्थन हटाने की प्रक्रिया के लिए एक तीन-स्तरीय प्रणाली का प्रावधान किया था। इसमें शामिल था:</p>
<p>1. प्रारंभिक राय के लिए एक आंतरिक चिकित्सा बोर्ड।</p>
<p>2. जिला कलेक्टर द्वारा गठित एक समीक्षा बोर्ड।</p>
<p>3. न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा अंतिम भौतिक सत्यापन।</p>
<p>यह प्रक्रिया बेहद जटिल और समय लेने वाली थी, जिसके कारण इसे लागू करना मुश्किल साबित हुआ। जनवरी 2023 में, सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए कुछ प्रावधानों को हटा दिया, जैसे कि न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनुमति और जिला कलेक्टर की आवश्यकता। लेकिन फिर भी, यह प्रक्रिया लोगों को बहुत कठिन और लंबी लगती है, जिसके कारण बहुत कम लोग इस विकल्प को चुनते हैं।</p>
<p><strong>सामाजिक और सांस्कृतिक धारणाएँ</strong></p>
<p>भारत में मृत्यु को लेकर बहुत गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक धारणाएँ हैं। भारतीय समाज में, परिवार को जीवन के हर पहलू में सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, और मृत्यु को एक संवेदनशील और धार्मिक घटना के रूप में देखा जाता है। मृत्यु से संबंधित निर्णय लेना, विशेष रूप से जीवन समर्थन को हटाने का निर्णय, एक भावनात्मक और धार्मिक पहलू से जुड़ा हुआ है।</p>
<p>अधिकांश भारतीय परिवार मानते हैं कि जीवन को हर कीमत पर बनाए रखना चाहिए, भले ही मरीज को पीड़ा हो रही हो। यह सोच कि किसी के जीवन समर्थन को बंद करना गलत है, बहुत गहरे से जुड़ी हुई है। कई बार, परिवार सोचता है कि जीवन समर्थन हटाने का निर्णय लेने से वे अपने प्रियजन की &#8220;हत्या&#8221; कर रहे हैं, जबकि वे सिर्फ उनकी पीड़ा को समाप्त करना चाहते हैं।</p>
<p><strong>चिकित्सा जगत की जिम्मेदारी</strong></p>
<p>चिकित्सा जगत में भी जीवन के अंत की देखभाल को लेकर स्पष्टता और जागरूकता की कमी है। ज्यादातर डॉक्टर इस विषय पर बातचीत करने से हिचकते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि इससे कानूनी या सामाजिक समस्याएँ हो सकती हैं। कई डॉक्टर अपने मरीजों के परिवारों को इस विकल्प के बारे में जानकारी नहीं देते, क्योंकि वे खुद इस प्रक्रिया से अज्ञात होते हैं या इसे अपनाने में झिझकते हैं।</p>
<p>डॉ. ई. दिवाकरन, जो त्रिशूर में दर्द और उपशामक देखभाल सोसायटी के निदेशक हैं, कहते हैं कि जीवन के अंत की देखभाल को अपनाने के लिए &#8220;मृत्यु साक्षरता&#8221; की आवश्यकता है। इसका मतलब है कि डॉक्टरों और मरीजों दोनों को यह समझने की आवश्यकता है कि जीवन के अंत की देखभाल क्या होती है, और इसका उद्देश्य मरीज की पीड़ा को कम करना होता है, न कि उनकी जीवन को जबरदस्ती खत्म करना।</p>
<p><strong>&#8220;निष्क्रिय इच्छामृत्यु&#8221; बनाम &#8220;अंग समर्थन वापस लेना&#8221;: नामकरण का प्रभाव</strong></p>
<p>डॉक्टरों का मानना है कि &#8220;निष्क्रिय इच्छामृत्यु&#8221; या &#8220;जीवन रक्षक प्रणाली वापस लेना&#8221; जैसे शब्द भ्रमित कर सकते हैं। इन शब्दों के उपयोग से ऐसा प्रतीत हो सकता है जैसे डॉक्टर रोगी को मारने की प्रक्रिया में शामिल हैं, जो कि सच नहीं है। इसलिए, डॉक्टरों का सुझाव है कि इसे &#8220;अंग समर्थन वापस लेना&#8221; या &#8220;उपशामक देखभाल&#8221; कहना अधिक सटीक और उपयुक्त होगा।</p>
<p>नामकरण का फर्क इसलिए पड़ता है, क्योंकि जब शब्द अधिक सकारात्मक और सहानुभूतिपूर्ण होते हैं, तो लोग उन्हें अधिक आसानी से समझते और स्वीकारते हैं।</p>
<p><strong>जीवन के अंत की देखभाल की दिशा में आगे का रास्ता</strong></p>
<p>हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने जीवन के अंत की देखभाल के कानूनी पक्ष को स्पष्ट कर दिया है, फिर भी इसे व्यवहार में लागू करने के लिए बहुत काम किया जाना बाकी है। इसके लिए सबसे पहले, डॉक्टरों और मरीजों के बीच खुली बातचीत होनी चाहिए। डॉक्टरों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे अपने मरीजों और उनके परिवारों को सही समय पर सही जानकारी दें, ताकि वे कठिन निर्णय लेने से पहले सभी विकल्पों पर विचार कर सकें।</p>
<p>इसके अलावा, समाज में भी इस विषय पर अधिक जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है। मृत्यु एक स्वाभाविक घटना है, और इसके प्रति संवेदनशीलता और समझदारी से निर्णय लेने की आवश्यकता है।</p>
<p>भारत जैसे समाज में, जहां परिवार और धर्म का विशेष स्थान है, वहां जीवन के अंत की देखभाल को स्वीकारना एक बड़ी चुनौती हो सकता है। लेकिन जागरूकता, शिक्षा, और संवाद के माध्यम से, इसे अधिक व्यापक रूप से स्वीकार किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong>प्रभात भारत विशेष</strong></p>
<p>भारत में सम्मान के साथ मरने का अधिकार कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है, लेकिन इसे अपनाने की दर अभी भी बहुत कम है। इसका कारण कई स्तरों पर पाया जा सकता है &#8211; कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता, समाज में मृत्यु के प्रति धारणाएँ, और चिकित्सा समुदाय में जागरूकता की कमी।</p>
<p>फिर भी, इस विषय पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि मरीज और उनके परिवार समझ सकें कि जीवन के अंत की देखभाल क्या होती है, और उन्हें यह निर्णय लेने का अधिकार मिले कि वे किस प्रकार से मरना चाहते हैं। डॉक्टरों, कानूनविदों, और समाज के सभी लोगों को इस दिशा में सहयोग करना होगा ताकि जीवन के अंत की देखभाल का अधिकार वास्तव में सभी तक पहुंच सके।</p>
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		<title>रतन टाटा: देश सेवा में अतुलनीय योगदान के बावजूद भारत रत्न से वंचित, क्या अब सरकार अपनी गलती सुधार पाएगी?</title>
		<link>https://www.prabhatbharat.com/ratan-tata-denied-bharat-ratna-despite-his-incomparable-contribution-to-the-service-of-the-nation-will-the-government-be-able-to-rectify-its-mistake-now/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Oct 2024 23:19:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[Bharat Ratan]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली 10 अक्टूबर। भारत के उद्योग जगत के एक महानायक, एक आदर्श और एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व, रतन</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/ratan-tata-denied-bharat-ratna-despite-his-incomparable-contribution-to-the-service-of-the-nation-will-the-government-be-able-to-rectify-its-mistake-now/">रतन टाटा: देश सेवा में अतुलनीय योगदान के बावजूद भारत रत्न से वंचित, क्या अब सरकार अपनी गलती सुधार पाएगी?</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली 10 अक्टूबर। भारत के उद्योग जगत के एक महानायक, एक आदर्श और एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व, रतन टाटा, अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन के साथ ही देश ने न केवल एक उद्योगपति को खो दिया, बल्कि एक ऐसे महान व्यक्ति को खोया है जिसने सामाजिक, आर्थिक और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता दी। देश और समाज के लिए उनके अविस्मरणीय योगदान को देखते हुए, अब यह सवाल और भी प्रबल हो गया है कि आखिर क्यों रतन टाटा को जीवित रहते हुए भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया?</p>
<p>रतन टाटा को उनके योगदान के लिए भारत रत्न न दिए जाने पर अब हर तरफ से आवाजें उठ रही हैं कि सरकार को अपनी इस भूल को सुधारना चाहिए। उनका जीवन और कार्य भारत के लिए प्रेरणा का स्रोत रहे हैं और यह बात अब और भी स्पष्ट हो गई है कि उन्हें सम्मानित करने में सरकार से एक बड़ी चूक हुई है। इस लेख में हम विस्तार से रतन टाटा के जीवन, उनके द्वारा देश के लिए किए गए योगदान, और भारत रत्न न मिलने की परिस्थितियों पर चर्चा करेंगे। साथ ही, यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्यों अब उनके लिए भारत रत्न की घोषणा होनी चाहिए।</p>
<p><strong>रतन टाटा का जीवन: एक संक्षिप्त परिचय</strong></p>
<p>रतन टाटा का जन्म 28 दिसंबर 1937 को एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार में हुआ था। वे प्रसिद्ध उद्योगपति जमशेदजी टाटा के वंशज थे। रतन टाटा का पालन-पोषण उनके दादा जे.आर.डी. टाटा के मार्गदर्शन में हुआ, जिन्होंने टाटा समूह को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया था। रतन टाटा ने अपनी शिक्षा हार्वर्ड बिजनेस स्कूल और कॉर्नेल विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई और भारतीय उद्योग जगत का प्रमुख हिस्सा बना।</p>
<p>रतन टाटा ने 1991 में टाटा समूह का नेतृत्व संभाला और इसे न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विस्तार दिया। उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने कई सफल अधिग्रहण किए, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण &#8216;जगुआर लैंड रोवर&#8217; और &#8216;कोरस&#8217; इस्पात कंपनी की खरीदारी थी। टाटा समूह के तहत उन्होंने टाटा मोटर्स, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), टाटा पावर और टाटा स्टील जैसी कंपनियों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।</p>
<p><strong>देश के प्रति रतन टाटा का योगदान</strong></p>
<p>रतन टाटा का योगदान केवल उद्योग जगत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने अपने कार्यों और नीतियों के जरिए देश की आर्थिक और सामाजिक उन्नति में भी बड़ा योगदान दिया। उन्होंने कई सामाजिक परियोजनाओं और संस्थाओं को वित्तीय और वैचारिक समर्थन दिया। टाटा ट्रस्ट, जिसकी नींव उन्होंने रखी, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, स्वच्छता और जल संरक्षण के क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य कर रहा है।</p>
<p><strong>टाटा नैनो: आम आदमी की कार</strong></p>
<p>रतन टाटा का मानना था कि उद्योग केवल मुनाफे के लिए नहीं होता, बल्कि इसका उद्देश्य समाज की सेवा करना भी होना चाहिए। इसी दृष्टिकोण से प्रेरित होकर उन्होंने &#8216;टाटा नैनो&#8217; का निर्माण कराया। यह कार भारत के निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए बनाई गई थी, ताकि हर परिवार का सपना पूरा हो सके कि वे एक कार के मालिक बनें। टाटा नैनो की कीमत को बेहद कम रखा गया, जिससे यह कार आम आदमी की पहुंच में आ सकी। यह केवल एक व्यावसायिक सफलता नहीं थी, बल्कि यह उनके समाज सेवा के दृष्टिकोण का प्रमाण थी।</p>
<p><strong>जगुआर और कोरस: भारतीय उद्योग की वैश्विक पहचान</strong></p>
<p>रतन टाटा के नेतृत्व में टाटा समूह ने &#8216;जगुआर लैंड रोवर&#8217; और &#8216;कोरस&#8217; इस्पात कंपनी का अधिग्रहण किया, जिससे टाटा समूह को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठा मिली। यह अधिग्रहण भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ, क्योंकि यह दिखाता था कि भारतीय कंपनियां अब वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने और प्रतिष्ठित ब्रांड्स का नेतृत्व करने में सक्षम हो चुकी हैं। रतन टाटा का यह कदम भारतीय उद्योग जगत की ताकत और उसकी वैश्विक उपस्थिति को स्थापित करने में मददगार रहा।</p>
<p><strong>सामाजिक सेवा में रतन टाटा का योगदान</strong></p>
<p>रतन टाटा के कार्यों का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक सेवा और मानवीय कल्याण के लिए समर्पित रहा। उन्होंने टाटा ट्रस्ट के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर योगदान दिया। टाटा ट्रस्ट के तहत उन्होंने देश के पिछड़े और वंचित वर्गों की सहायता के लिए कई योजनाएं शुरू कीं।</p>
<p>रतन टाटा ने विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कई उच्च शिक्षा संस्थानों को आर्थिक सहायता प्रदान की, जिनमें प्रमुख रूप से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) शामिल हैं। इसके अलावा, उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए, जिनसे लाखों बच्चों को लाभ हुआ।</p>
<p><strong>रतन टाटा का देश के प्रति समर्पण</strong></p>
<p>रतन टाटा का देशभक्ति का जज्बा भी किसी से कम नहीं था। जब 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के दौरान ताज होटल, जो टाटा समूह का हिस्सा है, पर हमला हुआ, तो रतन टाटा ने न केवल पीड़ितों की मदद की, बल्कि खुद ताज होटल के पुनर्निर्माण कार्य में भी जुट गए। उनके इस कदम से यह स्पष्ट हुआ कि उनके लिए उद्योग से पहले देश और समाज का कल्याण आता है। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में देश का साथ दिया और अपनी ओर से हरसंभव सहायता की।</p>
<p><strong>भारत रत्न: देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान</strong></p>
<p>भारत रत्न, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, देश के उन नागरिकों को प्रदान किया जाता है जिन्होंने अपने कार्यों से देश को गौरवान्वित किया हो। यह सम्मान राजनीति, कला, साहित्य, विज्ञान, सामाजिक कार्य, और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान देने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है। हालांकि, उद्योग जगत से जुड़े व्यक्तियों को इस सम्मान से नवाजा जाना बहुत दुर्लभ है।</p>
<p><strong>रतन टाटा के लिए भारत रत्न की मांग</strong></p>
<p>रतन टाटा की असाधारण उपलब्धियों और देश के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए, उनके समर्थक लंबे समय से उनके लिए भारत रत्न की मांग कर रहे थे। उनके निधन के बाद, यह मांग और भी प्रबल हो गई है। सोशल मीडिया पर भी यह चर्चा जोरों पर है कि रतन टाटा को जीवित रहते हुए भारत रत्न क्यों नहीं दिया गया।</p>
<p>लोगों का मानना है कि रतन टाटा का योगदान केवल उद्योग जगत में ही नहीं, बल्कि समाज के हर पहलू में महत्वपूर्ण रहा है। उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने न केवल आर्थिक क्षेत्र में बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों को भी बड़ी गंभीरता से निभाया है। उनके निधन के बाद, अब यह सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह इस चूक को सुधारने का प्रयास करे और उन्हें भारत रत्न से सम्मानित करे।</p>
<p><strong>सरकार की चुप्पी: एक बड़ी भूल?</strong></p>
<p>रतन टाटा जैसे व्यक्ति को भारत रत्न न दिए जाने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं, यह एक बड़ा सवाल है। क्या यह उद्योग जगत से जुड़े लोगों को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति है, या फिर सरकार की प्राथमिकताएं अलग हैं? रतन टाटा के कार्यों और उनकी उपलब्धियों को देखते हुए, यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्हें यह सम्मान जीवित रहते हुए मिलना चाहिए था।</p>
<p><strong>क्या सरकार अब सुधार करेगी अपनी भूल?</strong></p>
<p>रतन टाटा के निधन के बाद देश ने एक महानायक को खो दिया है, लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्य और उनके आदर्श हमेशा देशवासियों के दिलों में जीवित रहेंगे। अब समय आ गया है कि सरकार इस चूक को सुधारे और रतन टाटा को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करे। उनका यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान का सम्मान होगा, बल्कि यह उद्योग और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में भारतीयों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी मान्यता देगा।</p>
<p>रतन टाटा की महानता और उनके योगदान को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि वे भारत रत्न के योग्य हैं। सरकार को अब यह फैसला लेना चाहिए और उनके लिए भारत रत्न की घोषणा करनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके योगदान को सदैव याद रखें और उनसे प्रेरणा लें।</p>
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		<title>आयकर विभाग ने 9,570 रुपए की आय पर लगाया 43.5 लाख रुपए टैक्स</title>
		<link>https://www.prabhatbharat.com/income-tax-department-imposed-tax-of-rs-43-5-lakh-on-income-of-rs-9570/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Oct 2024 01:05:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>भारतीय नागरिक द्वारा घोषित 9,570 रुपए की आय पर 43.5 लाख रुपए टैक्स: US आय को जोड़े जाने</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/income-tax-department-imposed-tax-of-rs-43-5-lakh-on-income-of-rs-9570/">आयकर विभाग ने 9,570 रुपए की आय पर लगाया 43.5 लाख रुपए टैक्स</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>भारतीय नागरिक द्वारा घोषित 9,570 रुपए की आय पर 43.5 लाख रुपए टैक्स: US आय को जोड़े जाने के बाद कर निर्धारण</strong></p>
<p>नई दिल्ली 9 अक्टूबर। हाल ही में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि अमेरिका में अर्जित आय भी भारत में रहने वाले एक व्यक्ति के लिए कर योग्य होगी। यह मामला उस व्यक्ति से संबंधित है जिसने वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए अपनी आय ₹9,570 घोषित की थी। हालांकि, जब अमेरिका में अर्जित आय को इसमें जोड़ा गया, तो उसकी कर योग्य आय ₹43.5 लाख तक पहुंच गई। इस मामले ने यह स्पष्ट किया है कि भारत में कराधान के नियम किस प्रकार लागू होते हैं, खासकर तब जब व्यक्ति की आय अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से हो।</p>
<p><strong>कराधान के लिए आवासीय स्थिति का महत्व</strong></p>
<p>आयकर नियमों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की कर देनदारी उसकी आवासीय स्थिति पर निर्भर करती है। अगर कोई व्यक्ति भारत में निवास कर रहा है, तो उसे अपने विश्वव्यापी आय पर कर देना होता है। दूसरी ओर, अगर कोई व्यक्ति ‘गैर-निवासी’ (Non-Resident) होता है, तो उस पर केवल भारत में अर्जित आय पर ही कर लागू होता है, जबकि विदेशों में अर्जित आय कर के दायरे से बाहर रहती है।</p>
<p>इस मामले में, संबंधित व्यक्ति भारत और अमेरिका दोनों देशों का कर-निवासी था। इसका मतलब था कि उसे दोनों देशों के कर कानूनों का पालन करना था, जो इस प्रकार के मामलों में अक्सर जटिल हो जाते हैं।</p>
<p><strong>&#8216;टाई-ब्रेकर टेस्ट&#8217; का उपयोग</strong></p>
<p>जब कोई व्यक्ति एक से अधिक देशों का कर-निवासी होता है, तो उसे किसी एक देश में कर दायित्व का निर्धारण करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कर संधियों का सहारा लेना पड़ता है। इस मामले में, भारत और अमेरिका के बीच लागू दोहरे कराधान बचाव समझौता (DTAA) प्रमुख था।</p>
<p>इस समझौते के तहत ‘टाई-ब्रेकर टेस्ट’ नामक नियम का पालन किया जाता है, जिसका उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि व्यक्ति किस देश में प्राथमिक तौर पर निवास करता है। इस परीक्षण में कई महत्वपूर्ण कारकों पर विचार किया जाता है, जैसे कि व्यक्ति का स्थायी निवास, उसके पारिवारिक और आर्थिक हित, उसका पेशेवर जीवन, और किस देश में उसके महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध होते हैं।</p>
<p>आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण ने इन सभी कारकों पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि व्यक्ति का &#8216;केंद्रीय हित&#8217; (Centre of Vital Interest) भारत के करीब था, इसलिए उसे भारत में अपने अमेरिकी आय पर कर देना होगा।</p>
<p><strong>मामला और कर निर्धारण</strong></p>
<p>यह मामला उस समय सामने आया जब व्यक्ति ने वर्ष 2012-13 के लिए अपनी आय ₹9,570 घोषित की थी। हालांकि, जब आयकर अधिकारियों ने उसकी अमेरिकी आय का भी लेखा-जोखा किया, तो उसकी कर योग्य आय ₹43.5 लाख तक बढ़ गई।</p>
<p>इस संबंध में व्यक्ति ने तर्क दिया कि उसकी अमेरिकी आय पर पहले ही अमेरिका में कर अदा किया जा चुका था, और इसलिए उसे भारत में दोबारा उस पर कर देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। लेकिन ITAT ने कहा कि चूंकि वह भारत में भी कर-निवासी है और उसकी &#8216;केंद्रीय हित&#8217; भारत में है, इसलिए उसे अपनी अमेरिकी आय पर भारत में भी कर देना होगा।</p>
<p>हालांकि, ITAT ने यह भी स्पष्ट किया कि दोहरे कराधान से बचने के लिए व्यक्ति उस कर की छूट का दावा कर सकता है, जो उसने अमेरिका में पहले ही भुगतान किया है। इस प्रकार, अमेरिका में अदा किए गए कर को भारत में देय कर से घटाया जा सकता है।</p>
<p><strong>भारत और अमेरिका के बीच दोहरे कराधान समझौता (DTAA)</strong></p>
<p>भारत और अमेरिका के बीच दोहरे कराधान बचाव समझौता (DTAA) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति को एक ही आय पर दो देशों में कर न देना पड़े। लेकिन यह संधि इस बात पर आधारित है कि व्यक्ति किस देश का कर-निवासी है।</p>
<p>इस संधि के तहत, अगर कोई व्यक्ति दोनों देशों में निवास करता है, तो ‘टाई-ब्रेकर टेस्ट’ के माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि उसका मुख्य निवास स्थान कौन सा देश होगा। इस परीक्षण के कई चरण होते हैं, जैसे कि व्यक्ति का स्थायी निवास किस देश में है, उसका पारिवारिक और सामाजिक जीवन कहां स्थित है, और उसका पेशेवर और आर्थिक हित किस देश से जुड़ा है।</p>
<p>इस मामले में ITAT ने पाया कि व्यक्ति का ‘केंद्रिय हित’ भारत में था, क्योंकि उसका परिवार, संपत्ति और अधिकतर आर्थिक गतिविधियां भारत में थीं। इसलिए उसे अपनी अमेरिकी आय पर भारत में भी कर देना पड़ा।</p>
<p><strong>अन्य आयकर नियम और समझौते</strong></p>
<p>भारत ने अन्य कई देशों के साथ भी दोहरे कराधान बचाव समझौते किए हैं, ताकि भारतीय नागरिकों को विदेशों में अर्जित आय पर कर के दोहरे भार से बचाया जा सके। इसके बावजूद, अगर किसी व्यक्ति का ‘केंद्रीय हित’ भारत में है, तो उसे विदेशों में अर्जित आय पर भी भारत में कर देना होता है।</p>
<p>इस तरह के मामलों में करदाताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अपनी सभी आय, चाहे वह किसी भी देश में अर्जित की गई हो, को सही तरीके से घोषित करें और संबंधित देशों के कर नियमों का पालन करें।</p>
<p><strong>प्रभात भारत विशेष</strong></p>
<p>इस मामले में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण का निर्णय यह बताता है कि भारतीय नागरिकों को विदेशी आय पर भी कर दायित्व का सामना करना पड़ सकता है, खासकर जब वे दोनों देशों के कर-निवासी हों। व्यक्ति की कर देनदारी उसके ‘केंद्रीय हित’ और निवास स्थान पर निर्भर करती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कर संधियों और ‘टाई-ब्रेकर टेस्ट’ के माध्यम से निर्धारित किया जाता है।</p>
<p>यह फैसला उन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है जो विदेशों में काम कर रहे हैं या आय अर्जित कर रहे हैं, क्योंकि उनकी विदेशी आय भी भारत में कर योग्य हो सकती है, खासकर तब जब उनका मुख्य निवास भारत में हो।</p>
<p>करदाताओं को हमेशा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अपनी आय के स्रोतों को सही तरीके से घोषित करें और विभिन्न देशों के कर समझौतों का पालन करें ताकि वे किसी भी कानूनी या वित्तीय जटिलता से बच सकें।</p>
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		<title>भारत सरकार ने सीसीटीवी को लेकर बनाए नए नियम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Oct 2024 03:04:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[कारोबार]]></category>
		<category><![CDATA[खास खबर]]></category>
		<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[विदेश]]></category>
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		<category><![CDATA[Indian government]]></category>
		<category><![CDATA[Indian government made new rules regarding CCTV]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नए नियमों से हिकविजन और दहुआ के सीसीटीवी कैमरे भारत में नहीं होंगे प्रयोग  नई दिल्ली 1 अक्टूबर।</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/indian-government-made-new-rules-regarding-cctv/">भारत सरकार ने सीसीटीवी को लेकर बनाए नए नियम</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>नए नियमों से हिकविजन और दहुआ के सीसीटीवी कैमरे भारत में नहीं होंगे प्रयोग </strong></p>
<p>नई दिल्ली 1 अक्टूबर। सरकार कथित तौर पर देश में चीन निर्मित निगरानी उपकरणों के उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए तैयार है। सरकार निगरानी बाजार में स्थानीय विक्रेताओं के पक्ष में दिशा-निर्देशों के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए तैयार है। पेजर विस्फोटों के मद्देनजर, सरकार आपूर्ति श्रृंखला के कुछ घटकों या भागों की महत्वपूर्ण सोर्सिंग पर बारीकी से नजर रखेगी। &#8220;सरकार की निगरानी कैमरों पर नीति 8 अक्टूबर को लागू होने की संभावना है, जो प्रभावी रूप से बाजार से चीनी खिलाड़ियों को खत्म कर देगी, जिससे भारतीय कंपनियों को फायदा होगा। जबकि राजपत्र अधिसूचनाएँ इस वर्ष मार्च और अप्रैल में जारी की गई थीं, सूत्रों ने बताया कि सरकार ने लेबनान विस्फोटों के मद्देनजर इसके कार्यान्वयन में तेज़ी लाई है और सुरक्षा पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। सरकार सीसीटीवी कैमरों पर दिशा-निर्देशों के कार्यान्वयन को तेज़ करने के लिए तैयार है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong> चीनी कंपनियाँ जिन पर सरकार के नए नियमों का होगा असर</strong></p>
<p> वर्तमान में, सीपी प्लस, हिकविजन और दहुआ भारत में 60% से अधिक बाजार को नियंत्रित करते हैं और उन्हें अपने निगरानी पोर्टफोलियो में स्थानीयकरण सामग्री को बेहतर बनाने और आरएंडडी पर दोगुना जोर देने के लिए अपने प्रयासों को आगे बढ़ाना होगा, जबकि सीपी प्लस एक भारतीय कंपनी है जबकि हिकविजन और दहुआ चीनी कंपनी हैं। नवंबर 2022 में, संयुक्त राज्य अमेरिका सरकार ने संघीय संचार आयोग (FCC) के माध्यम से, &#8220;राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अस्वीकार्य जोखिम&#8221; के कारण हिकविजन और दहुआ से उपकरणों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया। चीनी सीसीटीवी कंपनियों को अमेरिका में प्रतिबंधित कर दिया गया एफसीसी ने कंपनियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा घोषित किया क्योंकि चिंता थी कि उनके उपकरणों का इस्तेमाल चीन द्वारा अमेरिका पर जासूसी करने के लिए किया जा सकता है। जानकार लोगों ने यह भी कहा कि हाल ही में, भारत सरकार ने भी हिकविजन और दहुआ के उपकरणों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। चीन के सीसीटीवी उपकरण निविदाओं को खारिज कर दिया है और बॉश जैसे यूरोपीय कंपनी को प्राथमिकता दे रहा है। उल्लेखनीय रूप से, यह अनुमान लगाया गया है कि बॉश अपने चीनी समकक्षों की तुलना में लगभग 7-10 गुना अधिक महंगा है। भारत सरकार चाहती है कि सीसीटीवी केवल &#8216;विश्वसनीय स्थानों&#8217; से ही हों। &#8216;सीसीटीवी पर जोर पेजर विस्फोटों से पहले से है।&#8217; &#8216;सुरक्षा प्रमाणन पर दिशा-निर्देश मार्च में जारी किए गए थे और अक्टूबर में लागू होंगे। यह विस्फोटों के बारे में कम और सीसीटीवी कैमरों से डेटा लीक होने की संभावना के बारे में अधिक है, जो संवेदनशील स्थानों पर स्थापित किए जाते हैं और लोगों की गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए उपयोग किए जा सकते हैं। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि केवल विश्वसनीय स्थानों से ही कैमरे का उपयोग किया जाए।&#8221;</p>
<p style="text-align: center;"><strong> विश्वसनीय स्थान क्या हैं? </strong></p>
<p>&#8220;विश्वसनीय स्थान&#8221; वह होगा जहाँ भारत सरकार को पूरी विनिर्माण श्रृंखला पर नज़र रखने की सुविधा होगी और उसे पूरा विश्वास होगा कि उपकरणों में कोई बैकडोर नहीं है जो डेटा लीक या निकाल सकता है। हालाँकि &#8220;रिप एंड रिप्लेस&#8221; नीति अभी विचाराधीन नहीं है, लेकिन भविष्य में यह एक संभावना बनी हुई है। मार्च और अप्रैल में जारी किए गए दो अलग-अलग राजपत्र अधिसूचनाओं में से एक निगरानी कैमरों के लिए &#8220;मेक इन इंडिया&#8221; दिशा-निर्देशों पर केंद्रित थी, जबकि दूसरी सीसीटीवी प्रमाणन के मानदंडों को संबोधित करती थी। सरकार के आदेशों ने भारत में निगरानी प्रणालियों की खरीद में बदलाव की नींव रखी और निगरानी बाजार में घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया।</p>
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		<title>देसी गाय अब हुई राज्य-माता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 30 Sep 2024 12:49:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[खास खबर]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[Indian government]]></category>
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		<category><![CDATA[Upgov]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली, 30 सितंबर। महाराष्ट्र सरकार की तरफ से गाय के महत्व पर विचार करते हुए उन्हें राज्य</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/desi-cow-is-now-the-mother-of-the-state/">देसी गाय अब हुई राज्य-माता</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली, 30 सितंबर। महाराष्ट्र सरकार की तरफ से गाय के महत्व पर विचार करते हुए उन्हें राज्य माता की उपाधि दी है राज्य सरकार ने यह एक अधिसूचना जारी कर घोषित किया है महाराष्ट्र सरकार ने अपनी अधिसूचना में बताया है कि महाराष्ट्र सरकार ने वैदिक काल से ही देशी गायों के महत्व जैसे कारकों पर विचार करते हुए उनके कल्याण को बढ़ावा देने के लिए उन्हें &#8216;राज्यमाता-गोमाता&#8217; की उपाधि दी है। राज्य कृषि, डेयरी विकास, पशुपालन और मत्स्य पालन विभाग द्वारा जारी सरकारी संकल्प में कहा गया है कि मानव पोषण में देशी गाय के दूध का महत्व, आयुर्वेदिक और पंचगव्य उपचार और जैविक खेती में गाय के गोबर का उपयोग शामिल है। समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक के दौरान गोशालाओं में इन गायों के पालन-पोषण के लिए 50 रुपये प्रतिदिन की सब्सिडी योजना लागू करने का निर्णय लिया है</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="wp-image-2776 size-full aligncenter" src="https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot_20240930_173715_TOI.jpg" alt="" width="939" height="1209" srcset="https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot_20240930_173715_TOI.jpg 939w, https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot_20240930_173715_TOI-233x300.jpg 233w, https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot_20240930_173715_TOI-795x1024.jpg 795w, https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/09/Screenshot_20240930_173715_TOI-768x989.jpg 768w" sizes="(max-width: 939px) 100vw, 939px" /></p>
<p>महाराष्ट्र गोसेवा आयोग द्वारा इस पहल का उद्देश्य संघर्षरत गोशालाओं को सहायता प्रदान करना और देशी गायों की घटती जनसंख्या को रोकना है, जो 2019 के अनुसार 20.69% कम हुई है। उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने कहा देशी गायें हमारे किसानों के लिए वरदान हैं इसलिए, हमने उन्हें राज्य माता का दर्जा देने का फैसला किया है। हमने गोशालाओं में देशी गायों के पालन-पोषण के लिए सहायता देने का भी फैसला किया है। इस योजना को गोसेवा आयोग द्वारा ऑनलाइन लागू किया जाएगा, जिसके तहत प्रत्येक जिले में एक जिला गोशाला सत्यापन समिति होगी। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों से पहले आया यह निर्णय भारतीय समाज में गाय के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है।</p>
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