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	<title>Income tax department Archives - Prabhat Bharat</title>
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		<title>आयकर विभाग ने 9,570 रुपए की आय पर लगाया 43.5 लाख रुपए टैक्स</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Oct 2024 01:05:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>
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		<category><![CDATA[Income tax department]]></category>
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		<category><![CDATA[Indian government]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>भारतीय नागरिक द्वारा घोषित 9,570 रुपए की आय पर 43.5 लाख रुपए टैक्स: US आय को जोड़े जाने</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><strong>भारतीय नागरिक द्वारा घोषित 9,570 रुपए की आय पर 43.5 लाख रुपए टैक्स: US आय को जोड़े जाने के बाद कर निर्धारण</strong></p>
<p>नई दिल्ली 9 अक्टूबर। हाल ही में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि अमेरिका में अर्जित आय भी भारत में रहने वाले एक व्यक्ति के लिए कर योग्य होगी। यह मामला उस व्यक्ति से संबंधित है जिसने वित्तीय वर्ष 2012-13 के लिए अपनी आय ₹9,570 घोषित की थी। हालांकि, जब अमेरिका में अर्जित आय को इसमें जोड़ा गया, तो उसकी कर योग्य आय ₹43.5 लाख तक पहुंच गई। इस मामले ने यह स्पष्ट किया है कि भारत में कराधान के नियम किस प्रकार लागू होते हैं, खासकर तब जब व्यक्ति की आय अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से हो।</p>
<p><strong>कराधान के लिए आवासीय स्थिति का महत्व</strong></p>
<p>आयकर नियमों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की कर देनदारी उसकी आवासीय स्थिति पर निर्भर करती है। अगर कोई व्यक्ति भारत में निवास कर रहा है, तो उसे अपने विश्वव्यापी आय पर कर देना होता है। दूसरी ओर, अगर कोई व्यक्ति ‘गैर-निवासी’ (Non-Resident) होता है, तो उस पर केवल भारत में अर्जित आय पर ही कर लागू होता है, जबकि विदेशों में अर्जित आय कर के दायरे से बाहर रहती है।</p>
<p>इस मामले में, संबंधित व्यक्ति भारत और अमेरिका दोनों देशों का कर-निवासी था। इसका मतलब था कि उसे दोनों देशों के कर कानूनों का पालन करना था, जो इस प्रकार के मामलों में अक्सर जटिल हो जाते हैं।</p>
<p><strong>&#8216;टाई-ब्रेकर टेस्ट&#8217; का उपयोग</strong></p>
<p>जब कोई व्यक्ति एक से अधिक देशों का कर-निवासी होता है, तो उसे किसी एक देश में कर दायित्व का निर्धारण करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कर संधियों का सहारा लेना पड़ता है। इस मामले में, भारत और अमेरिका के बीच लागू दोहरे कराधान बचाव समझौता (DTAA) प्रमुख था।</p>
<p>इस समझौते के तहत ‘टाई-ब्रेकर टेस्ट’ नामक नियम का पालन किया जाता है, जिसका उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि व्यक्ति किस देश में प्राथमिक तौर पर निवास करता है। इस परीक्षण में कई महत्वपूर्ण कारकों पर विचार किया जाता है, जैसे कि व्यक्ति का स्थायी निवास, उसके पारिवारिक और आर्थिक हित, उसका पेशेवर जीवन, और किस देश में उसके महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध होते हैं।</p>
<p>आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण ने इन सभी कारकों पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि व्यक्ति का &#8216;केंद्रीय हित&#8217; (Centre of Vital Interest) भारत के करीब था, इसलिए उसे भारत में अपने अमेरिकी आय पर कर देना होगा।</p>
<p><strong>मामला और कर निर्धारण</strong></p>
<p>यह मामला उस समय सामने आया जब व्यक्ति ने वर्ष 2012-13 के लिए अपनी आय ₹9,570 घोषित की थी। हालांकि, जब आयकर अधिकारियों ने उसकी अमेरिकी आय का भी लेखा-जोखा किया, तो उसकी कर योग्य आय ₹43.5 लाख तक बढ़ गई।</p>
<p>इस संबंध में व्यक्ति ने तर्क दिया कि उसकी अमेरिकी आय पर पहले ही अमेरिका में कर अदा किया जा चुका था, और इसलिए उसे भारत में दोबारा उस पर कर देने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। लेकिन ITAT ने कहा कि चूंकि वह भारत में भी कर-निवासी है और उसकी &#8216;केंद्रीय हित&#8217; भारत में है, इसलिए उसे अपनी अमेरिकी आय पर भारत में भी कर देना होगा।</p>
<p>हालांकि, ITAT ने यह भी स्पष्ट किया कि दोहरे कराधान से बचने के लिए व्यक्ति उस कर की छूट का दावा कर सकता है, जो उसने अमेरिका में पहले ही भुगतान किया है। इस प्रकार, अमेरिका में अदा किए गए कर को भारत में देय कर से घटाया जा सकता है।</p>
<p><strong>भारत और अमेरिका के बीच दोहरे कराधान समझौता (DTAA)</strong></p>
<p>भारत और अमेरिका के बीच दोहरे कराधान बचाव समझौता (DTAA) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति को एक ही आय पर दो देशों में कर न देना पड़े। लेकिन यह संधि इस बात पर आधारित है कि व्यक्ति किस देश का कर-निवासी है।</p>
<p>इस संधि के तहत, अगर कोई व्यक्ति दोनों देशों में निवास करता है, तो ‘टाई-ब्रेकर टेस्ट’ के माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि उसका मुख्य निवास स्थान कौन सा देश होगा। इस परीक्षण के कई चरण होते हैं, जैसे कि व्यक्ति का स्थायी निवास किस देश में है, उसका पारिवारिक और सामाजिक जीवन कहां स्थित है, और उसका पेशेवर और आर्थिक हित किस देश से जुड़ा है।</p>
<p>इस मामले में ITAT ने पाया कि व्यक्ति का ‘केंद्रिय हित’ भारत में था, क्योंकि उसका परिवार, संपत्ति और अधिकतर आर्थिक गतिविधियां भारत में थीं। इसलिए उसे अपनी अमेरिकी आय पर भारत में भी कर देना पड़ा।</p>
<p><strong>अन्य आयकर नियम और समझौते</strong></p>
<p>भारत ने अन्य कई देशों के साथ भी दोहरे कराधान बचाव समझौते किए हैं, ताकि भारतीय नागरिकों को विदेशों में अर्जित आय पर कर के दोहरे भार से बचाया जा सके। इसके बावजूद, अगर किसी व्यक्ति का ‘केंद्रीय हित’ भारत में है, तो उसे विदेशों में अर्जित आय पर भी भारत में कर देना होता है।</p>
<p>इस तरह के मामलों में करदाताओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अपनी सभी आय, चाहे वह किसी भी देश में अर्जित की गई हो, को सही तरीके से घोषित करें और संबंधित देशों के कर नियमों का पालन करें।</p>
<p><strong>प्रभात भारत विशेष</strong></p>
<p>इस मामले में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण का निर्णय यह बताता है कि भारतीय नागरिकों को विदेशी आय पर भी कर दायित्व का सामना करना पड़ सकता है, खासकर जब वे दोनों देशों के कर-निवासी हों। व्यक्ति की कर देनदारी उसके ‘केंद्रीय हित’ और निवास स्थान पर निर्भर करती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय कर संधियों और ‘टाई-ब्रेकर टेस्ट’ के माध्यम से निर्धारित किया जाता है।</p>
<p>यह फैसला उन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है जो विदेशों में काम कर रहे हैं या आय अर्जित कर रहे हैं, क्योंकि उनकी विदेशी आय भी भारत में कर योग्य हो सकती है, खासकर तब जब उनका मुख्य निवास भारत में हो।</p>
<p>करदाताओं को हमेशा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अपनी आय के स्रोतों को सही तरीके से घोषित करें और विभिन्न देशों के कर समझौतों का पालन करें ताकि वे किसी भी कानूनी या वित्तीय जटिलता से बच सकें।</p>
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