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	<title>Drug mafiya Archives - Prabhat Bharat</title>
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		<title>नर्सिंग होम और बड़े-बड़े मेडिकल स्टोर पर खपाई जाती है हिमाचल की नकली दवायें</title>
		<link>https://www.prabhatbharat.com/fake-medicines-from-himachal-are-found-in-nursing-homes-and-big-medical-stores/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Oct 2024 13:30:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[खास खबर]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[Drug mafiya]]></category>
		<category><![CDATA[Fake medicines]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>गोंडा, लखीमपुर खीरी, बहराइच, अयोध्या जैसे छोटे-छोटे जनपदों में फैला है मेडिकल माफिया का जाल लखनऊ 25 अक्टूबर।</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>गोंडा, लखीमपुर खीरी, बहराइच, अयोध्या जैसे छोटे-छोटे जनपदों में फैला है मेडिकल माफिया का जाल</strong></p>
<p style="padding-left: 40px;">लखनऊ 25 अक्टूबर। बद्दी और सोलन जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में दवा माफिया का नियंत्रण दिन-प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा है। यहां निर्मित नकली और घटिया गुणवत्ता की दवाएं न केवल हिमाचल प्रदेश बल्कि पूरे भारत में गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर रही हैं। केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) और स्टेट ड्रग कंट्रोलर द्वारा किए गए सैंपल परीक्षणों में यह सामने आया है कि इन क्षेत्रों में कई कंपनियां दवाओं के गुणवत्ता मानकों का पालन नहीं कर रही हैं। इनका संचालन बड़े पैमाने पर होता है और ये दवाएं देश के विभिन्न हिस्सों में आसानी से पहुंचाई जाती हैं।</p>
<p><strong>बद्दी और सोलन: नकली दवाओं का केंद्र</strong></p>
<p>बद्दी और सोलन में कई फार्मास्युटिकल कंपनियां दवाओं का निर्माण कर रही हैं। इनमें से कई कंपनियां थर्ड-पार्टी मैन्युफैक्चरिंग के जरिए नकली और घटिया गुणवत्ता की दवाएं बना रही हैं। हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक स्थिति, सस्ती जमीन, और कम कर दरों ने इसे दवा निर्माण का एक बड़ा केंद्र बना दिया है।</p>
<p>हाल ही में सीडीएससीओ द्वारा 49 दवाओं के सैंपल जांचे गए, जिनमें से 20 सैंपल फेल पाए गए। इसके अतिरिक्त, स्टेट ड्रग कंट्रोलर द्वारा परीक्षण किए गए 18 सैंपलों में से 3 भी मानकों पर खरे नहीं उतरे। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि यहां दवा माफिया का प्रभाव कितना व्यापक है। इन दवाओं में हार्ट अटैक, ब्लड शुगर और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाएं भी शामिल हैं। ऐसे में ये नकली और असुरक्षित दवाएं पूरे देश में मरीजों की जान के लिए गंभीर खतरा हैं।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter wp-image-3731 size-full" src="https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/10/file-6IGZ9hE4bzXHs79mPXKDi1LH.webp" alt="" width="1792" height="1024" srcset="https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/10/file-6IGZ9hE4bzXHs79mPXKDi1LH.webp 1792w, https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/10/file-6IGZ9hE4bzXHs79mPXKDi1LH-300x171.webp 300w, https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/10/file-6IGZ9hE4bzXHs79mPXKDi1LH-1024x585.webp 1024w, https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/10/file-6IGZ9hE4bzXHs79mPXKDi1LH-768x439.webp 768w, https://www.prabhatbharat.com/wp-content/uploads/2024/10/file-6IGZ9hE4bzXHs79mPXKDi1LH-1536x878.webp 1536w" sizes="(max-width: 1792px) 100vw, 1792px" /></p>
<p><strong>हिमाचल प्रदेश में घटिया गुणवत्ता की दवाओं का निर्माण</strong></p>
<p>हिमाचल प्रदेश के बद्दी, सोलन, और सिरमौर जिलों में दवा कंपनियां मानकों के अनुसार दवाएं नहीं बना रही हैं। यहां से बनी दवाओं में निम्न गुणवत्ता और मानकों से कम सक्रिय तत्व पाए जा रहे हैं, जो मरीजों को उचित लाभ नहीं पहुंचा पाते हैं। सीडीएससीओ और राज्य ड्रग कंट्रोलर के मुताबिक, कुल 23 दवाएं मानकों पर खरी नहीं उतरीं, जिनमें से 12 सोलन, 10 सिरमौर और एक कांगड़ा में निर्मित थीं।</p>
<p>इनमें सिरमौर की पुष्कर फार्मा कंपनी की प्रसव में काम आने वाली ऑक्सीटोसिन, बद्दी की मर्टिन एवं ब्राउन कंपनी की हार्ट अटैक की दवा कैल्शियम ग्लूकोनेट, और पांवटा साहिब की जी लैबोट्री कंपनी में बनी निमोनिया की सेफ्ट्रिएक्सोन जैसी दवाएं शामिल हैं। इन दवाओं का असफल होना गंभीर चिंताओं को जन्म देता है, क्योंकि ये जीवनरक्षक दवाएं हैं।</p>
<p><strong>थर्ड-पार्टी मैन्युफैक्चरिंग: मुनाफा कमाने का जरिया</strong></p>
<p>बद्दी और सोलन में बड़ी संख्या में कंपनियां थर्ड-पार्टी मैन्युफैक्चरिंग करती हैं। इसका मतलब है कि ये कंपनियां अन्य ब्रांड्स या मेडिकल स्टोर्स के लिए दवाएं बनाती हैं, जो बाद में उन ब्रांड्स के नाम से बाजार में बेची जाती हैं। थर्ड-पार्टी मैन्युफैक्चरिंग में लागत कम होती है, जिससे कंपनियों को अधिक मुनाफा होता है।</p>
<p>इस तरह की मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रिया में अक्सर गुणवत्ता नियंत्रण की अनदेखी की जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि दवाएं मानकों पर खरी नहीं उतरतीं और वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती हैं। इस प्रणाली के चलते बद्दी और सोलन से बनी नकली दवाएं देशभर के मेडिकल स्टोर्स में पहुंचाई जा रही हैं।</p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश में नकली दवाओं का प्रभाव</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों में भी बद्दी और सोलन से नकली दवाएं पहुंच रही हैं। गोंडा, बस्ती, बलरामपुर, अयोध्या, लखीमपुर खीरी, बहराइच, संत कबीर नगर, महाराजगंज, सीतापुर, जालौन, झांसी, सोनभद्र, मिर्जापुर, जौनपुर जैसे कई जनपदों में कई नर्सिंग होम और मेडिकल स्टोर्स हैं जो हिमाचल प्रदेश से सस्ते दामों पर दवाएं खरीदते हैं और उन्हें स्थानीय मरीजों को बेचते हैं। ऐसी दवाओं में अक्सर सक्रिय तत्वों की मात्रा मानकों से कम होती है, जिससे वे प्रभावी नहीं होतीं और मरीज की स्थिति में सुधार नहीं हो पाता।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मरीज इसी फॉर्मूले की दवा किसी ब्रांडेड कंपनी से खरीदते हैं, तो उनकी लागत भी काम होगी, और गुणवत्ता भी सुनिश्चित होगी। दूसरी ओर, थर्ड-पार्टी मैन्युफैक्चरिंग के जरिए बनाई गई ये दवाएं महंगी होती हैं, क्योंकि इन पर कोई मूल्य का निर्धारण नहीं होता जो मर्जी आई वह एमआरपी में प्रिंट कर दिया और इनमें मानकों की अनदेखी होने की संभावना भी अधिक रहती है।</p>
<p><strong>दवा माफिया के मुनाफे का खेल</strong></p>
<p>बद्दी और सोलन में दवा माफिया नकली दवाओं के कारोबार से अरबों रुपये कमा रहे हैं। इन माफियाओं का नेटवर्क बहुत मजबूत है, जो नकली और घटिया दवाओं की आपूर्ति पूरे देश में करते हैं। इनके पास अत्याधुनिक तकनीक और संसाधन होते हैं, जिससे वे इन दवाओं को असली जैसी दिखने वाली पैकेजिंग में बनाकर बेचते हैं। नकली दवाओं के उत्पादन और वितरण के इस विशाल नेटवर्क के कारण मरीजों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है और उन्हें इलाज का सही लाभ नहीं मिल पाता।</p>
<p>दवा माफिया के खिलाफ कार्रवाई करना कठिन होता है क्योंकि इनके पास उच्च स्तरीय संपर्क और संसाधन होते हैं। ये लोग कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए जाली दस्तावेज और कानूनी प्रक्रियाओं में धोखाधड़ी का सहारा लेते हैं। वहीं, स्थानीय अधिकारियों और स्वास्थ्य संस्थानों पर इन माफियाओं का दबाव बना रहता है।</p>
<p><strong>सीडीएससीओ और स्टेट ड्रग कंट्रोलर की भूमिका</strong></p>
<p>केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) और स्टेट ड्रग कंट्रोलर ने नकली दवाओं पर रोक लगाने की दिशा में कुछ सख्त कदम उठाए हैं। हाल ही में, मानकों पर खरी न उतरने वाली कंपनियों को नोटिस जारी किए गए हैं और उनके लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं। इसके अलावा, दवाओं का स्टॉक वापस मंगवाने का भी आदेश दिया गया है।</p>
<p>इन उपायों से नकली दवाओं के प्रसार को रोकने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, यह समस्या इतनी व्यापक है कि केवल लाइसेंस रद्द करने और नोटिस जारी करने से इसे पूरी तरह से नियंत्रित करना कठिन है। इस मुद्दे पर सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है, ताकि देशभर में लोगों को सुरक्षित और प्रभावी दवाएं मिल सकें।</p>
<p><strong>समाधान और आगे की राह</strong></p>
<p>बद्दी और सोलन में दवा माफिया के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए आवश्यक है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस समस्या पर सख्ती से नजर रखें। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है, जैसे कि:</p>
<p><strong>1. सख्त निगरानी:</strong> सीडीएससीओ और राज्य ड्रग कंट्रोलर को बद्दी और सोलन में निर्मित दवाओं पर नियमित जांच और निगरानी रखनी चाहिए।</p>
<p><strong>2. थर्ड-पार्टी मैन्युफैक्चरिंग पर नियंत्रण:</strong> थर्ड-पार्टी मैन्युफैक्चरिंग की प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है। कंपनियों को गुणवत्ता नियंत्रण के मानकों का पालन करना अनिवार्य बनाना चाहिए।</p>
<p><strong>3. उपभोक्ता जागरूकता:</strong> मरीजों को यह समझाने की आवश्यकता है कि ब्रांडेड दवाएं क्यों बेहतर हैं और नकली दवाओं से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूकता फैलानी चाहिए।</p>
<p><strong>4. कानूनी कार्रवाई:</strong> नकली दवाओं के कारोबार में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। इससे दवा माफिया पर लगाम लगाई जा सकेगी।</p>
<p><strong>5. स्थानीय संस्थानों की भूमिका:</strong> गोंडा जैसे छोटे शहरों में नकली दवाओं के प्रसार को रोकने के लिए स्थानीय स्वास्थ्य संस्थानों और मेडिकल स्टोर्स को प्रशिक्षित और जागरूक करना जरूरी है। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे मानकों के अनुरूप दवाएं ही अपने स्टॉक में रखें।</p>
<p>बद्दी और सोलन में दवा माफिया का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है, जिससे देशभर में नकली दवाओं का प्रसार हो रहा है। ये दवाएं मरीजों की जान को खतरे में डाल रही हैं और देश की स्वास्थ्य प्रणाली को कमजोर कर रही हैं। हिमाचल प्रदेश में बनी दवाओं का मानकों पर खरा न उतरना एक गंभीर समस्या है। नकली और घटिया गुणवत्ता वाली दवाओं के इस व्यापार को रोकने के लिए सरकार, स्वास्थ्य विभाग और जनता को मिलकर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।</p>
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		<title>दवाओं में मिलावट: टेलकम पाउडर या सिर्फ चाक, भारत की फर्मा छवि पर खतरा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 07 Oct 2024 16:03:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[स्वास्थ्य]]></category>
		<category><![CDATA[Adulteration in medicines: Talcum powder or just chalk]]></category>
		<category><![CDATA[Central drug standards control organisation]]></category>
		<category><![CDATA[Drug mafiya]]></category>
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		<category><![CDATA[Ministry of health and family welfare]]></category>
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		<category><![CDATA[threat to India's pharma image]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>भारत में नकली दवाओं का बढ़ता संकट: स्वास्थ्य पर मंडराता गंभीर खतरा नई दिल्ली 7 अक्टूबर (विजय प्रताप</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/adulteration-in-medicines-talcum-powder-or-just-chalk-threat-to-indias-pharma-image/">दवाओं में मिलावट: टेलकम पाउडर या सिर्फ चाक, भारत की फर्मा छवि पर खतरा</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><span style="color: #800000;"><strong>भारत में नकली दवाओं का बढ़ता संकट: स्वास्थ्य पर मंडराता गंभीर खतरा</strong></span></p>
<p>नई दिल्ली 7 अक्टूबर (विजय प्रताप पाण्डेय)। भारत में नकली और घटिया दवाओं का संकट दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है, और यह सवाल उठता है कि क्या बाजार में उपलब्ध दवाएं सचमुच असरदार हैं। भारत का दवा बाजार लगभग 25 बिलियन डॉलर का है, और इस विशाल बाजार का एक बड़ा हिस्सा नकली या मिलावटी दवाओं से भरा हो सकता है। कुछ अनुमान बताते हैं कि 20% से ज्यादा दवाएं या तो नकली हो सकती हैं या उनमें आवश्यक सक्रिय तत्वों की कमी हो सकती है। हालांकि सरकारी एजेंसियों का दावा है कि यह संख्या 5% से कम है, लेकिन हालिया जांच और मामलों ने इस मुद्दे को गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर दिया है।</p>
<p>नकली दवाओं की समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है; यह एक वैश्विक मुद्दा है। लेकिन भारत, जो 200 से अधिक देशों को दवाओं की आपूर्ति करता है, इस संकट से अधिक प्रभावित हो सकता है। भारत की सस्ती दवाओं का दुनिया भर में बहुत बड़ा बाजार है, खासकर विकासशील देशों में। इसलिए, जब इस तरह की दवाएं मानक गुणवत्ता से कम पाई जाती हैं, तो इसका असर केवल देश के भीतर तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी पड़ता है।</p>
<p>हालिया जाँच में यह पता चला है कि कई बड़ी और प्रतिष्ठित कंपनियों की दवाएं, जिन पर करोड़ों लोग भरोसा करते हैं, गुणवत्ताहीन साबित हो रही हैं। एक चौंकाने वाले खुलासे में, 50 से अधिक प्रमुख दवा ब्रांड्स केंद्र और राज्य सरकार की जांच के दायरे में आए, जहां यह पाया गया कि ये दवाएं विघटन परीक्षण या प्रयोगशाला परीक्षणों में विफल रहीं। इन परीक्षणों से यह पता चलता है कि दवाओं में सक्रिय अवयव पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं, जिससे वे बेअसर हो सकती हैं। मरीज, जो इन दवाओं पर निर्भर रहते हैं, उनके लिए यह गंभीर खतरा है क्योंकि ये दवाएं उनका इलाज करने में असफल हो सकती हैं या उनकी स्थिति और खराब कर सकती हैं।</p>
<p>जिन दवाओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनमें टोरेंट फार्मा की कैल्शियम सप्लीमेंट शेल्कल, एल्केम की एंटीबायोटिक क्लैवम, सन फार्मा की हृदय रोग की दवा पैन-डी, और ग्लेनमार्क की एंटी-हाइपरटेंसिव दवा टेल्मा एच शामिल हैं। ये सभी दवाएं अपने-अपने क्षेत्रों में अग्रणी हैं और करोड़ों की बिक्री करती हैं। उदाहरण के तौर पर, टोरेंट के शेल्कल की बिक्री 352 करोड़ रुपये से अधिक की थी, जबकि पैन-डी और क्लैवम की बिक्री क्रमश: 400 करोड़ और 430 करोड़ रुपये से अधिक की रही।</p>
<p>यह केवल छोटे निर्माताओं की बात नहीं है; बड़े और प्रतिष्ठित ब्रांड्स भी इस संकट की चपेट में हैं। इसका अर्थ यह है कि नकली दवाओं का खतरा हर स्तर पर मौजूद है।</p>
<p>नकली और मिलावटी दवाओं की समस्या केवल कंपनियों की लापरवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि सरकारी एजेंसियों और नियामकों की विफलता भी इसका एक बड़ा कारण है। केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाला केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) हर महीने मानक गुणवत्ता से कम (NSQ) दवाओं की सूची जारी करता है, लेकिन अक्सर यह सूची स्थानीय या छोटे निर्माताओं पर ही केंद्रित होती है। इस बार, जब बड़े ब्रांड्स की दवाएं इस सूची में शामिल हुईं, तो यह एक बड़ा हंगामा खड़ा कर गया।</p>
<p>नियामक एजेंसियों की विफलता का एक और उदाहरण नागपुर ग्रामीण पुलिस द्वारा पकड़ा गया नकली दवाओं का रैकेट है। इस रैकेट के तहत सरकारी अस्पतालों में एंटीबायोटिक दवाएं सप्लाई की जा रही थीं, जिनमें केवल टैल्कम पाउडर और स्टार्च पाया गया। यह रैकेट देश के कई राज्यों में फैला हुआ था और हवाला चैनलों के जरिए पैसे भेजे जाते थे। जाँच में आगे पता चला कि इस घोटाले का केंद्र हरिद्वार में स्थित पशु चिकित्सा दवाओं का एक निर्माता था। यह सब स्पष्ट रूप से दिखाता है कि नकली दवाओं की समस्या कितनी गहरी और व्यापक है।</p>
<p>यह समझना जरूरी है कि नकली और मानक गुणवत्ता से कम (NSQ) दवाओं के बीच अंतर होता है। नकली दवाएं जानबूझकर बनाई जाती हैं और बाजार में वितरित की जाती हैं। इन्हें सामान्यतः बिना लाइसेंस वाले निर्माता बनाते हैं, जो लोकप्रिय ब्रांड्स की पैकेजिंग की नकल करके उन्हें बेचते हैं। दूसरी तरफ, NSQ दवाएं वो होती हैं, जो किसी कारणवश मानक गुणवत्ता के परीक्षणों में विफल रहती हैं। यह संभव है कि ये दवाएं अनुचित भंडारण या निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ियों के कारण गुणवत्ताहीन हो जाती हैं।</p>
<p>फार्मा सप्लाई चेन के लिए डिजिटल समाधान प्रदान करने वाली हेजकी टेक के पार्टनर वरुण विसवाडिया कहते हैं कि अगर दवाओं को उनकी अनुशंसित सीमा से बाहर (बहुत गर्म या बहुत ठंडा) तापमान पर रखा जाता है, तो उनके सक्रिय तत्व नष्ट हो सकते हैं, जिससे उनकी प्रभावशीलता कम हो जाती है। इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ता है, क्योंकि वे सही इलाज नहीं पा पाते।</p>
<p>भारत दुनिया भर में सस्ती और प्रभावी दवाओं के आपूर्तिकर्ता के रूप में जाना जाता है। भारत में निर्मित दवाएं अफ्रीका, एशिया, और यहां तक कि अमेरिका और यूरोप के कई हिस्सों में भी पहुंचती हैं। लेकिन नकली और घटिया दवाओं की समस्या इस छवि को धूमिल कर रही है। भारतीय फार्मास्युटिकल एलायंस (IPA) ने नकली और NSQ दवाओं को लेकर मीडिया में आई रिपोर्टों पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि इन रिपोर्टों से भारतीय दवा उद्योग की छवि को गहरा नुकसान हुआ है और इसे ठीक करने के लिए बड़े कदम उठाने होंगे।</p>
<p>फर्मा से जुड़े लोगों का कहना है कि फार्मा उद्योग की सप्लाई चेन में सेंधमारी की समस्या है और नकली दवाओं का खतरा बढ़ रहा है। लेकिन साथ ही, उन्होंने मीडिया पर तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि NSQ दवाओं को नकली दवाओं के साथ जोड़ने से जनता में गलत धारणा पैदा हो रही है।</p>
<p style="text-align: center;"><strong><span style="color: #800000;">डॉक्टरों और अस्पतालों की चुप्पी क्यों?</span></strong></p>
<p>एक बड़ा सवाल यह है कि जब इन दवाओं से मरीजों को कोई फायदा नहीं हो रहा था, तो डॉक्टरों और अस्पतालों ने इसकी रिपोर्ट क्यों नहीं की? भारत में फार्माकोविजिलेंस प्रणाली, जिसका काम है दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों को रिकॉर्ड करना, स्पष्ट रूप से विफल रही है। डॉक्टरों और अस्पतालों ने नकली या घटिया दवाओं से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग नहीं की, जबकि उन्हें इसका प्रभाव दिखाई देना चाहिए था।</p>
<p>सरकार और नियामकों को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि दवाओं की गुणवत्ता पर सख्ती से नजर रखी जाए। अगस्त 2023 में भारत के औषधि महानियंत्रक ने आदेश जारी किया था कि शीर्ष 300 ब्रांड्स को नकली दवाओं की संभावना को कम करने के लिए अपने ब्रांड्स पर बारकोड या क्यूआर कोड छापने होंगे। इससे नकली दवाओं की पहचान और उन्हें बाजार में आने से रोकने में मदद मिलेगी।</p>
<p>इसके अलावा, तापमान की निगरानी के लिए फार्मेसियों और रिटेल स्टोर्स पर सख्त मानदंड लागू किए जाने चाहिए। भारत में केमिस्ट बहुत असंगठित हैं और तापमान की अनदेखी के कारण दवाएं अक्सर प्रभावहीन हो जाती हैं। इसलिए, दवाओं को सही तापमान पर रखने के लिए निगरानी और लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को सख्त करने की जरूरत है।</p>
<p>भारत में नकली दवाओं की समस्या गंभीर है, लेकिन यह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में भी नकली दवाओं का एक बड़ा बाजार है। हाल ही में मोटापा घटाने वाली दवाओं के नकली संस्करण अमेरिकी बाजार में पाए गए, जिनका इस्तेमाल लाखों लोग कर रहे थे। नकली दवाओं की यह वैश्विक समस्या है और इससे निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की जरूरत है।</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/adulteration-in-medicines-talcum-powder-or-just-chalk-threat-to-indias-pharma-image/">दवाओं में मिलावट: टेलकम पाउडर या सिर्फ चाक, भारत की फर्मा छवि पर खतरा</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
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