नई दिल्ली 14 जनवरी। किसी भी सभ्य समाज में डॉक्टर सिर्फ एक पेशा नहीं होता, वह भरोसा होता है। लेकिन भारत की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था ने 2025 में उस भरोसे को जिस तरह ज़मीन पर पटका है, वह आने वाले वर्षों तक याद रखा जाएगा। राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (NBEMS) द्वारा जारी नीट-पीजी 2025 का संशोधित कट-ऑफ नोटिस सिर्फ एक प्रशासनिक काग़ज़ नहीं, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की बुनियादी समझ पर करारा प्रहार है।
एससी-एसटी-ओबीसी वर्ग के लिए न्यूनतम योग्यता को शून्य पर्सेंटाइल और –40 अंक तय कर देना यह साफ़ संकेत देता है कि सिस्टम अब योग्यता नहीं, सिर्फ सीट भरने की मानसिकता से चल रहा है। सवाल यह नहीं है कि किस वर्ग को कितना आरक्षण मिला, सवाल यह है कि क्या अब डॉक्टर बनने के लिए पढ़ना भी ज़रूरी नहीं रहा?
–40 अंक: असफलता नहीं, चेतावनी होनी चाहिए थी
800 अंकों की परीक्षा में –40 अंक पाने वाला अभ्यर्थी यह साबित करता है कि उसने सही से ज़्यादा गलत उत्तर दिए। यह सामान्य असफलता नहीं, बल्कि विषय पर गंभीर पकड़ की कमी का संकेत है। ऐसे अभ्यर्थी को आम तौर पर दोबारा पढ़ाई, आत्ममंथन और तैयारी की ज़रूरत होती है—डिग्री की नहीं।
लेकिन नीट-पीजी 2025 में यही –40 अंक अब “योग्यता” बन गए हैं। यह निर्णय न सिर्फ तर्कहीन है, बल्कि खतरनाक भी। चिकित्सा कोई सामान्य अकादमिक क्षेत्र नहीं है, जहाँ प्रयोग की गुंजाइश हो। यहाँ एक गलत फैसला सीधे किसी इंसान की जान से जुड़ा होता है।
यह आरक्षण नहीं, व्यवस्था की असफलता है
आरक्षण सामाजिक न्याय का औज़ार है, लेकिन उसे अयोग्यता का प्रमाणपत्र बना देना सामाजिक न्याय नहीं, सामाजिक अपराध है। संविधान ने कभी नहीं कहा कि पिछड़े वर्गों के साथ न्याय करने के लिए मानकों को ही खत्म कर दिया जाए।
आज जो हो रहा है, वह आरक्षण का विस्तार नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं की अक्षमता पर पर्दा डालने की कोशिश है। सवाल छात्रों का नहीं है, सवाल उस सिस्टम का है जिसने मेडिकल सीटें बढ़ाईं, लेकिन शिक्षण गुणवत्ता, फैकल्टी और बुनियादी ढांचे पर ध्यान नहीं दिया।
खाली सीटों का भय, भरे दिमागों से बड़ा हो गया
सरकार और परीक्षा बोर्ड के स्तर पर यह दलील दी जा रही है कि सीटें खाली न रहें, डॉक्टरों की कमी न हो। लेकिन यह दलील अपने आप में स्वीकारोक्ति है कि नीति विफल रही। अगर MBBS के बाद PG के लिए योग्य छात्र नहीं मिल रहे, तो इसका मतलब है कि पूरी मेडिकल शिक्षा श्रृंखला में कहीं न कहीं गंभीर दोष है।
उस दोष का समाधान यह नहीं हो सकता कि कट-ऑफ को शून्य से नीचे गिरा दिया जाए। यह वैसा ही है जैसे पुल कमजोर हो, तो चेतावनी लगाने के बजाय वजन की परिभाषा ही बदल दी जाए।
मेहनत करने वालों के साथ खुला अन्याय
इस फैसले का सबसे बड़ा नैतिक नुकसान उन हज़ारों छात्रों को हुआ है जिन्होंने 200, 250 या 300 अंक लाकर भी सीट नहीं पाई। वर्षों की मेहनत, मानसिक दबाव, आर्थिक बोझ—सबका जवाब एक झटके में दे दिया गया:
“आपसे कम अंक वाला भी अब योग्य है।”
यह सिर्फ अन्याय नहीं, यह मेहनत का सार्वजनिक अपमान है। यह संदेश देता है कि पढ़ाई, अनुशासन और परिश्रम की इस व्यवस्था में कोई कीमत नहीं है।
मरीजों पर किया जा रहा खामोश प्रयोग
यह फैसला फाइलों में भले लिया गया हो, लेकिन इसका असर अस्पतालों में दिखेगा। आज –40 अंक पर PG में दाखिला, कल वही डॉक्टर ICU में निर्णय लेगा। तब न तो आरक्षण काम आएगा, न कट-ऑफ, न नोटिस।
जब कोई सर्जरी असफल होगी, जब कोई गलत दवा दी जाएगी, तब मरीज यह नहीं पूछेगा कि डॉक्टर किस वर्ग से था। वह सिर्फ यह पूछेगा—क्या यह डॉक्टर योग्य था?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की गिरती साख
दुनिया के किसी भी विकसित देश में मेडिकल PG के लिए न्यूनतम पासिंग मानक अडिग हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी—कहीं भी नेगेटिव स्कोर योग्यता नहीं माना जाता। भारत शायद पहला देश बनता जा रहा है जहाँ फेल होना भी सफलता का एक रूप बन गया है।
यह सिर्फ आंतरिक समस्या नहीं है। इससे भारतीय मेडिकल डिग्री की वैश्विक विश्वसनीयता भी प्रभावित होगी।
यह चेतावनी है, उत्सव नहीं
नीट-पीजी 2025 का यह फैसला किसी वर्ग की जीत नहीं है। यह पूरे सिस्टम की हार है। यह संकेत है कि हमने स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र को भी आंकड़ों और सीटों का खेल बना दिया है।
आज जरूरत है—
कट-ऑफ गिराने की नहीं
मेडिकल शिक्षा सुधारने की
और योग्यता को बचाने की
वरना आने वाली पीढ़ियाँ यही पूछेंगी—
क्या भारत में डॉक्टर बनने के लिए कभी पढ़ाई भी जरूरी हुआ करती थी?
यह लेख किसी छात्र के खिलाफ नहीं है।
यह उस व्यवस्था के खिलाफ है, जो अब खुद मरीजों को भगवान भरोसे छोड़ती दिख रही है।

