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	<title>Budget 2025 Archives - Prabhat Bharat</title>
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		<title>आम बजट 2025-26: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज करेंगी पेश, बजट पर विपक्ष-सरकार आमने-सामने</title>
		<link>https://www.prabhatbharat.com/general-budget-2025-26-finance-minister-nirmala-sitharaman-will-present-it-today-opposition-and-government-face-to-face-on-the-budget/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 01 Feb 2025 05:10:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Budget 2025]]></category>
		<category><![CDATA[General Budget 2025-26: Finance Minister Nirmala Sitharaman will present it today]]></category>
		<category><![CDATA[Nirmala sitaraman]]></category>
		<category><![CDATA[opposition and government face to face on the budget]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली, 1 फरवरी 2025: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज लोकसभा में आम बजट 2025-26 पेश करेंगी।</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/general-budget-2025-26-finance-minister-nirmala-sitharaman-will-present-it-today-opposition-and-government-face-to-face-on-the-budget/">आम बजट 2025-26: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज करेंगी पेश, बजट पर विपक्ष-सरकार आमने-सामने</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली, 1 फरवरी 2025: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज लोकसभा में आम बजट 2025-26 पेश करेंगी। यह बजट ऐसे समय में आ रहा है जब देश में लोकसभा चुनाव नजदीक हैं और राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है। विपक्ष और सरकार दोनों की ओर से बजट को लेकर प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। एक ओर जहां सरकार इस बजट को &#8220;समावेशी विकास&#8221; और &#8220;आर्थिक उछाल&#8221; का बजट बता रही है, वहीं विपक्ष इसे &#8220;पूंजीपतियों के लिए सहूलियतों का बजट&#8221; करार दे रहा है।</p>
<p><strong>विपक्ष का रुख: ‘बजट से कोई उम्मीद नहीं’</strong></p>
<p>बजट से ठीक पहले कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर निशाना साधा। नई दिल्ली सीट से कांग्रेस उम्मीदवार संदीप दीक्षित ने भाजपा सरकार के बजट पर सीधा हमला बोलते हुए कहा,</p>
<p>&#8220;कोई खास उम्मीद नहीं है। वे (भाजपा) पिछले 8-10 सालों से बजट पेश कर रहे हैं, लेकिन किसी भी उम्मीद पर खरे नहीं उतरे हैं। हम देखेंगे कि वे अपने बड़े पूंजीपतियों के लिए और कितने आयाम बनाते हैं&#8230; दिल्ली चुनाव चल रहे हैं। उन्हें पता है कि उन्हें दिल्ली में कुछ नहीं मिल रहा है, इसलिए संभव है कि वे दिल्ली की जनता से टैक्स या कुछ लोकलुभावन वादे करें।&#8221;</p>
<p>कांग्रेस नेता ने सरकार पर पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियों ने आम जनता के लिए मुश्किलें बढ़ाई हैं। उन्होंने आशंका जताई कि इस बार का बजट भी केवल चुनावी रणनीति के तहत होगा, जिसमें कुछ लोकलुभावन घोषणाएं की जाएंगी, लेकिन ज़मीनी हकीकत में आम आदमी को कोई बड़ी राहत नहीं मिलेगी।</p>
<p><strong>भाजपा का जवाब: ‘समावेशी विकास पर जोर’</strong></p>
<p>सरकार की ओर से भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने बजट को लेकर पूरी उम्मीद जताई। उन्होंने कहा,</p>
<p>&#8220;पूरी उम्मीद की जाती है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उनके विज़न ‘समावेशी विकास’ को ध्यान में रखते हुए बजट में ऐसे प्रावधान होंगे, जिससे लोगों को राहत मिलेगी और देश का व्यापार व अर्थव्यवस्था एक बार फिर छलांग लगाएगी।&#8221;</p>
<p>भाजपा नेता ने इस बजट को ‘आर्थिक सुधारों’ का महत्वपूर्ण चरण बताते हुए कहा कि यह बजट उद्योग, व्यापार और आम जनता को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। उनके अनुसार, मोदी सरकार का यह बजट किसानों, युवाओं और मध्यम वर्ग के लिए एक नई दिशा निर्धारित करेगा।</p>
<blockquote class="twitter-tweet" data-width="550" data-dnt="true">
<p lang="hi" dir="ltr"><a href="https://twitter.com/hashtag/WATCH?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#WATCH</a> दिल्ली: भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने <a href="https://twitter.com/hashtag/UnionBudget2025?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#UnionBudget2025</a> पर कहा, &quot;पूरी उम्मीद की जाती है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उनके विज़न समावेशी विकास को ध्यान में रखते हुए बजट में ऐसे प्रावधान होंगे जिससे लोगों को राहत मिलेगी और देश का व्यपार और अर्थव्यवस्था एक बार फिर… <a href="https://t.co/2tQ7sHyQXD">pic.twitter.com/2tQ7sHyQXD</a></p>
<p>&mdash; ANI_HindiNews (@AHindinews) <a href="https://twitter.com/AHindinews/status/1885534874590994581?ref_src=twsrc%5Etfw">February 1, 2025</a></p></blockquote>
<p><script async src="https://platform.twitter.com/widgets.js" charset="utf-8"></script></p>
<p>‘<strong>स्टार्टअप विफल रहा है’ – कर्नाटक सरकार के मंत्री का तंज</strong></p>
<p>कर्नाटक सरकार में मंत्री और कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने बजट पर तंज कसते हुए मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को पूरी तरह विफल बताया। उन्होंने कहा,&#8221;व्यक्तिगत रूप से मुझे बजट से कोई उम्मीद नहीं है। हमने 10 साल से अधिक समय तक प्रधानमंत्री मोदी के &#8216;मोदीनॉमिक्स&#8217; के मास्टरस्ट्रोक को देखा है और इसके कारण बेरोजगारी बढ़ी है&#8230; स्टार्टअप विफल रहा है, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया सभी कागजों में रह गए हैं और यह केवल नारा है&#8230; अभी FDI कितनी है?&#8221;</p>
<p>उन्होंने सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि हर साल सरकार बजट में बड़ी घोषणाएं करती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि न तो स्टार्टअप इंडिया सफल हुआ और न ही मेक इन इंडिया ने कोई बड़ा बदलाव किया।</p>
<p><strong>मध्यम वर्ग और रोजगार को लेकर बढ़ी चिंता</strong></p>
<p>इस बजट से सबसे अधिक उम्मीदें मध्यम वर्ग, नौकरीपेशा लोगों और व्यापारियों को हैं। बीते कुछ वर्षों में मध्यम वर्ग को टैक्स स्लैब में राहत की मांग करते देखा गया है, लेकिन सरकार की ओर से इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया।</p>
<p>इसके अलावा, बेरोजगारी भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। देश में नौकरियों की संख्या बढ़ाने और युवाओं को रोजगार देने की चुनौती सरकार के सामने है। विपक्ष का कहना है कि सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण देश में बेरोजगारी दर बढ़ी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने कई बार इसे मुद्दा बनाते हुए कहा है कि &#8220;मोदी सरकार नौकरियां पैदा करने में पूरी तरह असफल रही है।&#8221;</p>
<p><strong>महंगाई पर नियंत्रण की चुनौती</strong></p>
<p>महंगाई इस बार के बजट का एक महत्वपूर्ण विषय रहने वाला है। बीते वर्षों में खाद्य पदार्थों, ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है।</p>
<p>विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सरकार महंगाई को नियंत्रित करने में विफल रही है, जिससे आम जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। वहीं, सरकार का दावा है कि उसने महंगाई को काबू में रखने के लिए कई कदम उठाए हैं और इस बजट में भी इस दिशा में नए प्रावधान किए जाएंगे।</p>
<p><strong>रक्षा बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान</strong></p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार का बजट रक्षा क्षेत्र और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को लेकर भी महत्वपूर्ण होने वाला है। देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार रक्षा बजट में बढ़ोतरी कर सकती है।</p>
<p>साथ ही, सरकार हाईवे, रेलवे, मेट्रो प्रोजेक्ट और स्मार्ट सिटी योजनाओं के लिए अधिक धन आवंटित कर सकती है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर अधिक ध्यान देकर जनता के मूलभूत मुद्दों को दरकिनार कर रही है।</p>
<p><strong>वित्तीय घाटे पर भी रहेगी नजर</strong></p>
<p>भारत का वित्तीय घाटा भी एक अहम मुद्दा बना हुआ है। सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि वह घाटे को कम करने के लिए प्रभावी कदम उठा रही है। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार के बजट में सरकार नए निवेश और विदेशी पूंजी को आकर्षित करने पर भी ध्यान देगी।</p>
<p><strong>कृषि क्षेत्र की घोषणाओं पर रहेगी नजर</strong></p>
<p>किसान भी इस बजट से उम्मीद लगाए बैठे हैं। मोदी सरकार के पिछले बजट में किसानों के लिए कई योजनाएं लाई गई थीं, लेकिन किसानों की शिकायत है कि जमीनी स्तर पर उन्हें इनका पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। इस बार किसान संगठनों की नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार एमएसपी, कृषि कर्ज और अन्य योजनाओं पर क्या घोषणा करती है।</p>
<p><strong>क्या होगा टैक्सपेयर्स के लिए खास?</strong></p>
<p>मध्यम वर्ग को इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार नई टैक्स व्यवस्था में छूट को बढ़ा सकती है। साथ ही, होम लोन पर ब्याज दरों में कटौती और जीएसटी दरों में बदलाव को लेकर भी घोषणाएं हो सकती हैं।</p>
<p>आम बजट 2025-26 कई मायनों में महत्वपूर्ण है। एक ओर जहां सरकार इसे &#8220;आर्थिक विकास&#8221; का बजट बता रही है, वहीं विपक्ष इसे केवल &#8220;चुनावी बजट&#8221; मान रहा है। इस बार बजट में क्या खास होगा और यह जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतरेगा, यह देखने वाली बात होगी। लोकसभा चुनाव से पहले आने वाले इस बजट पर देशभर की नजरें टिकी हुई हैं।</p>
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		<title>भारत में रेवड़ी राजनीति: कल्याणकारी योजनाओं के पीछे का सच</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 27 Jan 2025 11:16:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Budget 2025]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi election]]></category>
		<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[Delhi elections]]></category>
		<category><![CDATA[Revdi politics]]></category>
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		<category><![CDATA[Revdi politics in India: The truth behind welfare schemes]]></category>
		<category><![CDATA[The truth behind welfare schemes]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>(विजय कुमार) नई दिल्ली 27 अक्टूबर। भारत में मिठाई का एक अनोखा महत्व है। यह न केवल स्वाद</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/revdi-politics-in-india-the-truth-behind-welfare-schemes/">भारत में रेवड़ी राजनीति: कल्याणकारी योजनाओं के पीछे का सच</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>(विजय कुमार) नई दिल्ली 27 अक्टूबर। भारत में मिठाई का एक अनोखा महत्व है। यह न केवल स्वाद और परंपरा का प्रतीक है, बल्कि सांस्कृतिक, भावनात्मक और सामाजिक रिश्तों का भी हिस्सा है। खासकर रेवड़ी, जो तिल, गुड़ और घी से बनी होती है, उत्तर भारत की एक साधारण मिठाई है। हालांकि, यह मिठाई अब अपने स्वाद के लिए नहीं, बल्कि राजनीति में &#8220;रेवड़ी संस्कृति&#8221; के संदर्भ में बदनाम हो गई है।</p>
<p>&#8220;रेवड़ी राजनीति&#8221; एक रूपक बन चुका है, जिसका उपयोग राजनीतिक दलों की लोकलुभावन नीतियों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। इसका अर्थ है मुफ्त सेवाएं, वस्तुएं या नकद हस्तांतरण के वादे, जिनके जरिए चुनावी मतदाताओं को आकर्षित किया जाता है। आलोचक इसे त्वरित लाभ के लिए तात्कालिक उपाय के रूप में देखते हैं, जो दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के लिए नुकसानदायक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या &#8220;रेवड़ी&#8221; को मात्र एक नकारात्मक संदर्भ में देखना सही है, और क्या यह राजकोषीय अनुशासन के खिलाफ है?</p>
<p><strong>रेवड़ी का उद्भव और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य</strong></p>
<p>रेवड़ी को उत्तर भारत में मिठाइयों की एक साधारण श्रेणी में गिना जाता था। पारंपरिक रूप से यह ठंड के मौसम में तिल और गुड़ के स्वास्थ्य लाभ के लिए खाई जाती थी। लेकिन राजनीतिक संदर्भ में इसका उपयोग तेजी से एक नकारात्मक रूपक के तौर पर बढ़ा। भारतीय राजनीति में, मुफ्त बिजली, पानी, राशन और नकद हस्तांतरण जैसी योजनाओं को &#8220;रेवड़ी बांटना&#8221; कहा जाने लगा। यह शब्द उन राजनीतिक दलों की आलोचना में प्रयुक्त होता है जो &#8220;लोकलुभावनवाद&#8221; के आधार पर सत्ता में आने का प्रयास करते हैं।</p>
<p>भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और आम आदमी पार्टी (आप) के बीच दिल्ली और पंजाब के चुनावों में इस शब्द का अत्यधिक उपयोग देखा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने &#8220;रेवड़ी संस्कृति&#8221; को आलोचना का विषय बनाते हुए इसे देश के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया। वहीं, आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने इसे जनहितैषी योजनाओं के रूप में पेश किया।</p>
<p><strong>रेवड़ी और जनता का मोह</strong></p>
<p>भारत जैसे विकासशील देश में, जहां गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली बड़ी आबादी है, मुफ्त की योजनाएं लोगों के जीवन में तत्काल राहत प्रदान करती हैं। चाहे वह मुफ्त राशन हो, महिलाओं को नकद हस्तांतरण हो, किसानों के लिए कर्ज माफी हो, या बेरोजगार युवाओं के लिए मासिक भत्ता हो, इन योजनाओं का जनता पर गहरा प्रभाव पड़ता है।</p>
<p>लेकिन यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन मुफ्त योजनाओं का वित्तीय भार कौन उठाता है? राजकोषीय घाटा, महंगाई और बढ़ते कर्ज का सीधा असर आम नागरिकों पर ही पड़ता है। यह एक सच्चाई है कि कोई भी कल्याणकारी योजना वास्तव में &#8220;मुफ्त&#8221; नहीं होती। सरकार को इन योजनाओं की लागत पूरी करने के लिए करों में वृद्धि करनी पड़ती है या उधारी लेनी पड़ती है।</p>
<p><strong>मुफ्त योजनाओं का आर्थिक प्रभाव</strong></p>
<p>रेवड़ी राजनीति का सबसे बड़ा प्रभाव देश की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। भारत का राजकोषीय घाटा पहले से ही अत्यधिक है। मुफ्त की योजनाओं को लागू करने के लिए सरकार को अपनी खर्च सीमा को पार करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि देश की 50% महिलाओं को प्रति माह 2,000 रुपये दिए जाते हैं, तो सालाना खर्च 8.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। यह राशि भारत के कुल राजकोषीय घाटे के लगभग 50% के बराबर होगी।</p>
<p>इस तरह की योजनाओं का दीर्घकालिक प्रभाव महंगाई और ब्याज दरों में वृद्धि के रूप में सामने आता है। जब सरकार अपने खर्चों को पूरा करने के लिए अधिक पैसा छापती है, तो बाजार में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ जाती हैं।</p>
<p>इसके अलावा, सरकारी उधारी बढ़ने से ब्याज दरें बढ़ती हैं, जिससे व्यापार और उद्योग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह विकास दर को धीमा कर देता है और रोजगार के अवसर कम कर देता है।</p>
<p><strong>राजनीतिक दलों का रवैया</strong></p>
<p>दिलचस्प बात यह है कि हर राजनीतिक दल &#8220;रेवड़ी राजनीति&#8221; का आलोचक होता है, लेकिन सत्ता में आने के बाद वह इन्हीं लोकलुभावन नीतियों को लागू करने में अग्रणी बन जाता है। चाहे वह मुफ्त बिजली और पानी की योजनाएं हों, या किसानों की कर्ज माफी, कोई भी सरकार इन वादों को वापस लेने का साहस नहीं करती।</p>
<p>लोकतंत्र में, जहां हर पांच साल में चुनाव होते हैं, मतदाताओं को खुश करना राजनीतिक दलों की प्राथमिकता बन जाता है। रेवड़ी जैसी लोकलुभावन योजनाएं मतदाताओं को तत्काल लाभ प्रदान करती हैं, जिससे चुनाव जीतने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।</p>
<p><strong>समाज पर प्रभाव</strong></p>
<p>रेवड़ी राजनीति का समाज पर एक नकारात्मक प्रभाव यह है कि यह जनता को आत्मनिर्भर बनने के बजाय सरकारी सहायता पर निर्भर बना देती है। यदि सरकार मुफ्त योजनाओं के बजाय रोजगार सृजन, बुनियादी ढांचे के विकास और शिक्षा पर अधिक ध्यान केंद्रित करे, तो यह दीर्घकालिक लाभ प्रदान कर सकता है।</p>
<p>इसके अतिरिक्त, मुफ्त की योजनाओं से सरकारी खजाने पर भार बढ़ता है, जिससे आवश्यक सेवाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा पर खर्च करने के लिए धन कम पड़ जाता है।</p>
<p><strong>क्या &#8220;रेवड़ी&#8221; को गलत समझा जा रहा है?</strong></p>
<p>यह कहना पूरी तरह से उचित नहीं होगा कि मुफ्त योजनाएं हमेशा खराब होती हैं। यदि इनका सही ढंग से प्रबंधन किया जाए और जरूरतमंदों तक सीमित रखा जाए, तो ये योजनाएं समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बना सकती हैं। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) ने गरीबी उन्मूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।</p>
<p>लेकिन समस्या तब होती है जब ये योजनाएं बेतरतीब और राजनीतिक लाभ के लिए लागू की जाती हैं। बिना किसी ठोस वित्तीय योजना के लागू की गई योजनाएं न केवल आर्थिक अस्थिरता का कारण बनती हैं, बल्कि समाज में असमानता को भी बढ़ावा देती हैं।</p>
<p><strong>आगे का रास्ता</strong></p>
<p>रेवड़ी राजनीति से बचने के लिए सरकारों को अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट करनी होंगी। दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए, सरकार को लोकलुभावन नीतियों के बजाय संरचनात्मक सुधारों पर ध्यान देना चाहिए।</p>
<p><strong>1. बजटीय अनुशासन:</strong> सरकार को अपने खर्चों को नियंत्रित करना चाहिए और प्राथमिकता के आधार पर धन का आवंटन करना चाहिए।</p>
<p><strong>2. लक्षित योजनाएं:</strong> मुफ्त की योजनाओं को केवल जरूरतमंदों तक सीमित रखना चाहिए। इसके लिए एक मजबूत डेटा आधार तैयार किया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>3. रोजगार सृजन:</strong> मुफ्त नकद हस्तांतरण के बजाय, रोजगार सृजन और उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>4. शिक्षा और स्वास्थ्य पर निवेश:</strong> मुफ्त सेवाओं के बजाय, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश करना दीर्घकालिक लाभ प्रदान कर सकता है।</p>
<p><strong>5. सुधारवादी नीतियां:</strong> कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में सुधार लाकर आर्थिक विकास को बढ़ावा देना चाहिए।</p>
<p><strong>प्रभात भारत विशेष</strong></p>
<p>रेवड़ी, जो कभी एक साधारण मिठाई थी, अब भारतीय राजनीति में लोकलुभावनवाद का प्रतीक बन चुकी है। &#8220;रेवड़ी राजनीति&#8221; केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक स्थिरता के लिए एक चुनौती भी है।</p>
<p>आवश्यकता इस बात की है कि हम, नागरिक के रूप में, इन योजनाओं के दीर्घकालिक प्रभावों को समझें और जिम्मेदार सरकारों को चुने जो जनहित में दीर्घकालिक और संरचनात्मक नीतियों को प्राथमिकता दें। राजनीति में रेवड़ी संस्कृति को समाप्त करने का मतलब केवल मुफ्त की योजनाओं को रोकना नहीं है, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जहां हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिले।</p>
<p>अंततः, यह हमारा देश है, और इसकी स्थिरता और समृद्धि की जिम्मेदारी हमारी है। रेवड़ी, चाहे वह मिठाई हो या राजनीति, उसे जिम्मेदारी के साथ परोसा जाना चाहिए।</p>
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		<title>8वें वेतन आयोग की घोषणा: केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ा कदम</title>
		<link>https://www.prabhatbharat.com/8th-pay-commission-announcement-a-big-step-for-central-government-employees/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jan 2025 15:43:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Budget 2025]]></category>
		<category><![CDATA[8th Pay Commission]]></category>
		<category><![CDATA[8th Pay Commission announcement: A big step for central government employees]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली 16 जनवरी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में 8वें</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/8th-pay-commission-announcement-a-big-step-for-central-government-employees/">8वें वेतन आयोग की घोषणा: केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ा कदम</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली 16 जनवरी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में 8वें वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दे दी गई। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस महत्वपूर्ण फैसले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आयोग के अध्यक्ष और दो सदस्यों की नियुक्ति जल्द ही की जाएगी। यह आयोग केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन, भत्ते, और पेंशन के पुनरीक्षण का कार्य करेगा।</p>
<p><strong>क्यों है यह फैसला अहम?</strong></p>
<p>वेतन आयोग केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन और मुआवजे के ढांचे को तय करने वाला मुख्य निकाय है। 8वें वेतन आयोग के गठन से कर्मचारियों को वेतन वृद्धि और अन्य लाभ मिलने की उम्मीद है। वर्तमान 7वें वेतन आयोग 1 जनवरी 2016 से लागू है और इसकी वैधता 2026 तक है। इसके बाद, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होंगी।</p>
<p>अश्विनी वैष्णव ने कहा कि सरकार ने 8वें वेतन आयोग के गठन की प्रक्रिया समय पर शुरू कर दी है, ताकि इसकी सिफारिशें समय पर मिल सकें और 1 जनवरी, 2026 से लागू की जा सकें।</p>
<p><strong>कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की उम्मीदें</strong></p>
<p>इस निर्णय से एक करोड़ से अधिक केंद्रीय सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी लाभान्वित होंगे। वे बेसब्री से 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों का इंतजार कर रहे हैं, जो उनके मूल वेतन, भत्तों, पेंशन और अतिरिक्त लाभों की समीक्षा करेगा।</p>
<p>7वें वेतन आयोग के बाद वेतन और पेंशन में हुए बदलावों ने केंद्रीय कर्मचारियों और सेवानिवृत्त कर्मियों को बड़ी राहत दी थी। 8वें वेतन आयोग से भी यही अपेक्षा की जा रही है कि यह महंगाई और आर्थिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए वेतन और भत्तों में संशोधन करेगा।</p>
<p><strong>वेतन आयोग का महत्व और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि</strong></p>
<p>वेतन आयोग का गठन केंद्र सरकार द्वारा हर दशक में किया जाता है। इसका उद्देश्य कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के मुआवजे को समयानुसार अपडेट करना है। इसमें आर्थिक संकेतक, जैसे मुद्रास्फीति, देश की आर्थिक स्थिति और कर्मचारियों की जरूरतों का ध्यान रखा जाता है।</p>
<p>7वें वेतन आयोग का गठन 28 फरवरी, 2014 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने किया था। आयोग ने अपनी सिफारिशें नवंबर 2015 में प्रस्तुत कीं, जो 1 जनवरी 2016 से लागू हुईं।</p>
<p><strong>7वें वेतन आयोग की उपलब्धियां</strong></p>
<p>7वें वेतन आयोग ने केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और पेंशन में बड़े सुधार किए। इसके तहत मूल वेतन में वृद्धि न्यूनतम वेतन को ₹7,000 से बढ़ाकर ₹18,000 प्रति माह किया गया। भत्तों में संशोधन महंगाई भत्ता (डीए) और हाउस रेंट अलाउंस (एचआरए) जैसे भत्तों में संशोधन किया गया। पेंशन में वृद्धि पेंशनभोगियों के लिए महंगाई राहत (डीआर) में वृद्धि की गई समावेशी लाभ कर्मचारियों और पेंशनभोगियों दोनों के लिए समान मुआवजा सुनिश्चित किया गया।</p>
<p><strong>8वें वेतन आयोग से उम्मीदें</strong></p>
<p>8वें वेतन आयोग की सिफारिशों से कर्मचारियों को निम्नलिखित क्षेत्रों में राहत मिलने की उम्मीद है:</p>
<p><strong>1. मूल वेतन में वृद्धि:</strong> मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम वेतन में बड़ा सुधार हो सकता है।</p>
<p><strong>2. महंगाई भत्ते का संशोधन:</strong> डीए और डीआर को नई दरों पर तय किया जाएगा।</p>
<p><strong>3. भत्तों का पुनर्गठन:</strong> हाउस रेंट अलाउंस और ट्रांसपोर्ट अलाउंस जैसे भत्तों में बदलाव की संभावना है।</p>
<p><strong>4. पेंशन सुधार:</strong> पेंशनभोगियों के लिए नई दरों पर राहत दी जा सकती है।</p>
<p><strong>5. आधुनिक जरूरतें:</strong> डिजिटलाइजेशन और नई तकनीक को ध्यान में रखते हुए कर्मचारियों को अतिरिक्त सुविधाएं मिल सकती हैं।</p>
<p><strong>कैसे होगी सिफारिशों की तैयारी?</strong></p>
<p>वेतन आयोग विभिन्न मंत्रालयों, विभागों और कर्मचारी संगठनों से जानकारी जुटाकर सिफारिशें तैयार करेगा। इन सिफारिशों में देश की आर्थिक स्थिति, राजस्व संग्रह और सरकारी खर्च का संतुलन भी शामिल होगा।</p>
<p><strong>आर्थिक चुनौतियां और सरकार का नजरिया</strong></p>
<p>वेतन आयोग की सिफारिशों का लागू होना सरकार के लिए आर्थिक चुनौती हो सकता है। हालांकि, सरकार ने पहले ही संकेत दिए हैं कि वह इन सिफारिशों को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है।</p>
<p>8वें वेतन आयोग का गठन केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए एक बड़ा कदम है। इससे न केवल वेतन और पेंशन में वृद्धि की उम्मीद है, बल्कि यह कर्मचारियों के जीवन स्तर को भी सुधारने में मदद करेगा।</p>
<p>आयोग की सिफारिशें तैयार होने और 2026 से लागू होने के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि यह कैसे केंद्रीय कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाता है।</p>
<p>सरकार के इस फैसले ने लाखों कर्मचारियों के बीच नई ऊर्जा भर दी है। आने वाले समय में, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें भारतीय प्रशासनिक तंत्र और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाल सकती हैं।</p>
<p>The post <a href="https://www.prabhatbharat.com/8th-pay-commission-announcement-a-big-step-for-central-government-employees/">8वें वेतन आयोग की घोषणा: केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ा कदम</a> appeared first on <a href="https://www.prabhatbharat.com">Prabhat Bharat</a>.</p>
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		<title>बजट 2025 के लिए कांग्रेस ने सरकार पर उठाए सवाल, जीडीपी वृद्धि के अनुमान में कटौती और आर्थिक सुस्ती पर जताई चिंता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रभात भारत]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 08 Jan 2025 13:41:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Budget 2025]]></category>
		<category><![CDATA[कारोबार]]></category>
		<category><![CDATA[बजट 2025]]></category>
		<category><![CDATA[Congress]]></category>
		<category><![CDATA[Congress raised questions on the government]]></category>
		<category><![CDATA[expressed concern over reduction in GDP growth estimates and economic slowdown]]></category>
		<category><![CDATA[Jayram ramesh]]></category>
		<category><![CDATA[Prabhat bharat]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली 8 जनवरी। आगामी केंद्रीय बजट 2025 को लेकर देश की राजनीति में गर्मा-गर्मी तेज हो गई</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली 8 जनवरी। आगामी केंद्रीय बजट 2025 को लेकर देश की राजनीति में गर्मा-गर्मी तेज हो गई है। आर्थिक वृद्धि में कमी और निवेश में सुस्ती के आंकड़ों के बीच मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने मोदी सरकार की नीतियों पर निशाना साधा है। कांग्रेस के महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश ने एक बयान जारी कर जीडीपी वृद्धि दर के हालिया अनुमानों, निजी निवेश में गिरावट, और खपत में कमी को लेकर सरकार को आड़े हाथों लिया। रमेश ने इसे सरकार की आर्थिक नीतियों की नाकामी करार देते हुए गरीबों, किसानों और मध्यम वर्ग के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है।</p>
<p>जयराम रमेश ने कहा कि चालू वित्त वर्ष (2024-25) के लिए जीडीपी वृद्धि का अनुमान घटाकर 6.4% कर दिया गया है, जो चार साल में सबसे कम है। उन्होंने इसे &#8220;निराशाजनक पृष्ठभूमि&#8221; बताते हुए कहा कि यह आरबीआई के हालिया 6.6% के अनुमान से भी कम है और पिछले वित्त वर्ष के 8.2% से काफी नीचे है।</p>
<p>उन्होंने कहा, &#8220;वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है। उत्पादन और निवेश में कमी, खपत में गिरावट और घरेलू बचत में कमी ने आर्थिक वृद्धि को ठप कर दिया है। सरकार को इस सच्चाई से इनकार करना बंद कर देना चाहिए।&#8221;</p>
<p>जयराम रमेश ने गरीबों और किसानों की स्थिति को सुधारने के लिए तीन प्रमुख सुझाव दिए:</p>
<p><strong>1. मनरेगा मजदूरी में वृद्धि:</strong> ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरी बढ़ाई जाए ताकि ग्रामीण गरीबों की क्रय शक्ति में सुधार हो सके।</p>
<p><strong>2. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में इजाफा:</strong> किसानों की समस्याओं को हल करने और कृषि क्षेत्र को मजबूती देने के लिए एमएसपी में बढ़ोतरी की जाए।</p>
<p><strong>3. मध्यम वर्ग को आयकर में राहत:</strong> आर्थिक दबाव से जूझ रहे मध्यम वर्ग को आयकर में राहत दी जाए।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने निजी खपत में गिरावट को अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा, &#8220;इस वर्ष की दूसरी तिमाही में निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) की वृद्धि दर घटकर 6% रह गई है, जो पिछली तिमाही में 7.4% थी।&#8221;</p>
<p>उन्होंने कहा कि मध्यम वर्ग की घटती क्रय शक्ति ने खपत को कमजोर किया है, जिससे अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। &#8220;कार की बिक्री चार साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। भारतीय उद्योग जगत के सीईओ भी &#8216;सिकुड़ते&#8217; मध्यम वर्ग पर चिंता जता चुके हैं।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने कहा कि सरकार निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ाने में विफल रही है। उन्होंने कहा, &#8220;सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) में इस वर्ष केवल 6.4% की वृद्धि होने की उम्मीद है, जो पिछले वर्ष के 9% की तुलना में काफी कम है।&#8221;</p>
<p>उन्होंने पूंजीगत व्यय के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा कि 2024-25 के बजट में 11.11 लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत निवेश का वादा किया गया था, लेकिन नवंबर तक केवल 5.13 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए। यह पिछले वर्ष की तुलना में 12% कम है।</p>
<p>रमेश ने घरेलू बचत में गिरावट को भी आर्थिक संकट का प्रमुख कारण बताया। उन्होंने कहा, &#8220;2020-21 से 2022-23 के बीच परिवारों की शुद्ध बचत में 9 लाख करोड़ रुपये की गिरावट आई है। घरेलू वित्तीय देनदारियां जीडीपी के 6.4% तक पहुंच गई हैं, जो दशकों में सबसे अधिक है।&#8221;</p>
<p>उन्होंने आरोप लगाया कि कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार की नीतिगत विफलताएं आज भी भारतीय परिवारों को परेशान कर रही हैं।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने जीएसटी प्रणाली को &#8220;हास्यास्पद रूप से जटिल&#8221; करार देते हुए इसे सरल बनाने की मांग की। उन्होंने मध्यम वर्ग को आर्थिक राहत देने के लिए आयकर प्रणाली में सुधार और करों में कटौती का सुझाव दिया।</p>
<p>जयराम रमेश ने सरकार पर आर्थिक मोर्चे पर विफलता का आरोप लगाते हुए कहा, &#8220;पिछले 10 वर्षों में भारत की खपत की कहानी उलट गई है। खपत में नरमी न केवल जीडीपी वृद्धि दर को प्रभावित कर रही है, बल्कि इसके कारण निजी क्षेत्र अपनी क्षमता विस्तार में निवेश करने से भी हिचकिचा रहा है।&#8221;</p>
<p>उन्होंने कहा कि नई परियोजनाओं में निवेश और उत्पादकता बढ़ाने के लिए आवश्यक निवेश की कमी ने मध्यम अवधि में वृद्धि की संभावनाओं को कमजोर किया है।</p>
<p>कांग्रेस ने सरकार से मांग की कि बजट 2025 में विकास और निवेश को प्राथमिकता दी जाए। रमेश ने कहा, &#8220;सरकार को खपत, निवेश, और उत्पादन को पुनर्जीवित करने के लिए ठोस और मौलिक कदम उठाने होंगें।</p>
<p>आगामी बजट 2025 सिर्फ एक आर्थिक दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि यह सरकार की प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण को दर्शाने वाला मंच होगा। कांग्रेस के आरोपों और सुझावों के बीच, यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार कैसे अपनी नीतियों को आकार देती है।</p>
<p>जयराम रमेश ने कहा, &#8220;बजट 2025 भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का आखिरी मौका हो सकता है। सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।&#8221;</p>
<p>अब 1 फरवरी को पेश होने वाले बजट से उम्मीदें और सवाल दोनों बढ़ गए हैं। क्या सरकार अपने वादों पर खरी उतरेगी, या कांग्रेस के आरोप सही साबित होंगे? यह तो आने वाला समय ही बताएगा।</p>
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