गोंडा/लखनऊ। यूजीसी के नए कानून को लेकर सियासी माहौल उस समय गरमा गया, जब पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने सोशल मीडिया पर एक लंबा, भावनात्मक और बेहद तीखा बयान जारी कर दिया। यह कोई औपचारिक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि गांव, समाज और सनातन परंपरा से जुड़ी उस पीड़ा की अभिव्यक्ति थी, जिसे उन्होंने “भारत की आत्मा पर सीधा प्रहार” करार दिया।
अपने पोस्ट में बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि उनका विरोध किसी जाति, वर्ग या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सोच के खिलाफ है, जो समाज को कागजों और कानूनों में बांटने का प्रयास कर रही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनके घर के बच्चे आज भी ओबीसी बच्चों और दलित बच्चों के साथ खेलते हैं, एक ही रसोई में बना भोजन साथ बैठकर खाते हैं। यह किसी सरकारी आदेश, अधिनियम या नियमावली के तहत नहीं होता, बल्कि यह सनातन परंपरा है, जो पीढ़ियों से हमारे समाज में बहती चली आ रही है।
उन्होंने कहा कि यह परंपरा हमारे नस-नस में है। इसे न कोई कानून सिखा सकता है और न कोई कानून खत्म कर सकता है। पूर्व सांसद ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका दर्शन स्पष्ट था—जो समाज के सबसे नीचे खड़ा है, उसे ऊपर लाना है। लेकिन यूजीसी का नया कानून इस विचारधारा के ठीक उलट समाज में समझ और संवेदना का टकराव पैदा कर रहा है।
बृजभूषण शरण सिंह ने सवाल उठाया कि आखिर किस दिशा में देश को ले जाने की तैयारी की जा रही है।
उन्होंने कहा —“क्या आप ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं, जहां भविष्य में किसी के घर में एंट्री हो और ओबीसी को रोका जाए?
क्या आप चाहते हैं कि दलित को यह महसूस कराया जाए कि वह इस समाज का हिस्सा नहीं है?”
उन्होंने कहा कि ऐसे सवाल अगर समाज में जन्म लेने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा।
पूर्व सांसद ने बेहद तीखे शब्दों में कहा कि समाज को दफ्तरों में बैठकर नहीं चलाया जा सकता। अगर समाज को समझना है, तो गांव में आना पड़ेगा। गांव की चौपाल, शादी-ब्याह, नेग-हक और सामाजिक सहभागिता—यही भारत की असली व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि गांव में जब शादी होती है, तो हर समाज का नेग तय होता है, हर किसी का हक होता है। वहां किसी से उसकी जाति पूछकर अधिकार तय नहीं किए जाते, बल्कि परंपरा और आपसी समझ से सब चलता है।
उन्होंने अपने हालिया सामाजिक आयोजनों का उदाहरण देते हुए कहा कि हाल ही में उन्होंने एक सनातन कथा का आयोजन कराया, जिसमें सद्गुरु रितेश्वर महाराज ने कथा कही। इस कथा के उद्घाटन में 52 समाजों के सद्गुरुओं को आमंत्रित किया गया। हर समाज से एक-एक वृक्ष लिया गया और ‘सनातन वाटिका’ बनाने का संकल्प लिया गया।
अभूतपर्व सांसद ने आरोप लगाया कि ऐसे कानून बनाकर सरकार उन सामाजिक प्रयासों को ही नष्ट करने पर आमादा है, जो समाज को जोड़ने का काम कर रहे हैं।
“आपने कानून बनाकर हमारे उस मिशन को स्वाहा कर दिया,”—उन्होंने लिखा।
बृजभूषण शरण सिंह ने साफ कहा कि यह कोई नई परंपरा नहीं है। यह वही सनातन परंपरा है, जिसने सदियों से भारत को जोड़े रखा है। उन्होंने कहा कि ऐसे किसी भी कानून की जरूरत नहीं है, जो समाज को जोड़ने की बजाय बांटने का काम करे।
उन्होंने चेतावनी दी कि हो सकता है इस कानून का असर तुरंत नीति-निर्माताओं पर न पड़े, लेकिन गांव में इसका असर गहराई से दिखेगा।
“गांव ऐसे नहीं चलता,”—उन्होंने लिखा—“अगर लोकतंत्र को जिंदा रखना है, तो यह देखना पड़ेगा कि गांव में क्या हो रहा है।”
पूर्व सांसद ने सरकार से इस कानून को तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि अगर इसे लागू किया गया, तो समाज में दरारें गहरी होंगी। भाईचारा टूटेगा, अविश्वास बढ़ेगा और सबसे बड़ा नुकसान बच्चों को होगा।
“यह कानून बच्चों को बांट देगा,”—उन्होंने लिखा—“और जब बच्चे बंटेंगे, तो आने वाला भविष्य कमजोर होगा।”
उन्होंने विरोध कर रहे लोगों से भी अपील की कि वे सिर्फ नारों और सोशल मीडिया तक सीमित न रहें, बल्कि ओबीसी समाज और दलित समाज के समझदार लोगों से संवाद करें। उनके साथ बैठें, बात करें और जमीनी सच्चाई को समझें।
“समाधान संवाद से निकलेगा, दीवारें खड़ी करने से नहीं,”—यह उनका स्पष्ट संदेश था।
अपने बयान के अंत में बृजभूषण शरण सिंह ने हाथ जोड़कर सरकार से अपील की कि ऐसे कानून न लाए जाएं, जो समाज को फाड़ने का काम करें। उन्होंने कहा कि देश, राष्ट्र और समाज का नुकसान किसी एक वर्ग का नुकसान नहीं होता, बल्कि पूरे भारत का नुकसान होता है।
यूजीसी के नए कानून पर उनका यह बयान अब केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं रहा। यह गांव, परंपरा और सामाजिक समरसता की ओर से दी गई एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गहराएगा और यूजीसी कानून को लेकर बहस और तेज होगी।

